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Independence Day 2018- फटी धोती पहन कर पहुंच गए थे दिल्ली,अवार्ड  देते वक्त रो पड़ीं थीं इंदिरा गांधी

कलम के सिपाही से थर-थर कांपते थे अंग्रेज, कई साल सलाखों के पीछे बिताए

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Independence Day 2018- फटी धोती पहन कर पहुंच गए थे दिल्ली,अवार्ड  देते वक्त रो पड़ीं थीं इंदिरा गांधी

कानपुर। बिठूर से नानाराव पेशवा ने अंग्रेजों के खिलाफ आजादी का बिगुल फूंका तो कानपुर हीं नही पूरा देश उनके पीछे चल पड़ा। सैकड़ों क्रांतिकारी अंग्रेजों से लड़ते-लड़ते शहीद हो तो कईयों के नाम से गोरे थर-थर कांपने लगे। इन्हीं में से एक दुबले-पतले क-काठी के युवक ने बंदूक की जगह कलम उठाई और स्याही के जरिए अंग्रेजों से देश को मुक्ति दिलाने के लिए लग गए। उन्होंने कलम के दम पर अग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आमशहरी के दिल और दिमाग में इतनी नफरत भर दी की, वो एक झंडे के नीचे आकर, ’विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा. गाने लगे। देश आजाद हुआ तो इस महान क्रांतिकारी को पुरूस्कार देने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री स्व इंदिरा गांधी ने दिल्ली बुलाया। आर्थिक स्थित अच्छी नहीं होने के चलते कलम का सिपाही फटी धोती पहन कर दिल्ली के लिए निकल गया। इदिरा गांधी ने जैसे ही उन्हें पुरूस्कार दिया तो उनकी नजर फटी धोती पर पड़ी। बताया जाता है, कि यह दृष्य देश वो रो पड़ी थीं।

कौन था कलम का सिपाही
जनरलगंज निवासी श्यामलाल गुप्ता (पार्षद जी) आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके खिले एक गीत को सुनकर हजारों की संख्या में लोग एक झंडे के नीचे आ गए थे और अंग्र्रजों भारत छोड़ों के नारे लगाने लगे थे। इतिहासकार मनोज कपूर बताते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री को फूलबाग में आना था। कांग्रेस के साथ ही अन्य क्रांतिकारियों को भीड़ जमा करनी थी। तभी श्याम लाल गुप्ता जी से कांग्रेस के नेताओं ने कहा कि कोई दमदार देशभक्ति गीत लिखा, जिसे पढ़कर लोग बेखौफ होकर सभा में पहुंचे। उन्होंने पूरी रात जाग कर झंडा गीत लिखा औरर सुबह जिसने पढ़ा वो अपने कदम रोक नहीं पाया। हजारों की संख्या में लोग फूलबाग पहुंचे और झंडा ऊंचा रहे हमारा. गीत गाने लगे लगे। यह देख पंडित जवाहर लाल नेहरू के गदगद हो गए थे। आजादी के बाद इन्हें 1973 में पद्मश्री अवार्ड देने के लिए दिल्ली बुलाया गया। उनके पास नए कपड़े खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। उन्होंने अपनी फटी धोती और कुर्ता पहनकर इंदिरा के बुलावे पर दिल्ली पहुंच गए। मंच पर उन्हें देख खुद गांधी अपने आंसू रोक नहीं पाई और रो पड़ी थीं।

1924 में फूलबाग मैदान में गाया था गीत
ठतिहासकार मनोज कपूर बताते हैं कि 1923 में फतेहपुर जिला कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। सभापति के रूप में पधारे मोतीलाल नेहरू को अधिवेशन के दूसरे दिन ही जरूरी काम से मुंबई जाना पड़ा। कांग्रेस ने उस समय तक ’तिरंगा झंडा’ तय कर लिया था, लेकिन जन-मन को प्रेरित कर सकने वाला कोई झंडागीत नहीं था। ये बात पार्षद जी को खटक गई। ऐसे में उन्होंने झंडागीत लिखने की ठान ली। साल 1924 में कानपुर में होने वाले अधिवेशन से पहले उन्होंने पूरी-पूरी रात जागकर झंडागीत की रचना कर दी। सात छंदों में लिखे इस गीत के पहले और आखरी छंद को बेहद लोकप्रियता मिली। जालियावाला बाग के स्मृति में पहली बार यह गीत 13 अप्रैल 1924 को कानपुर के फूलबाग मैदान में हजारों लोगो के सामने गाया गया। उस दौरान जवाहर लाल नेहरू भी इस आम सभा में मौजूद थे। नेहरू जी ने गीत को सुनकर कहा था, भले ही लोग श्याम लाल गुप्त को नहीं जानते होंगे, लेकिन पूरा देश राष्ट्रीय ध्वज पर लिखे गीत से जरूर परचित होंगे।

नरवल गांव में हुआ था जन्म
जनरल गंज इलाके में अपने जीवन की अंतिम सांस लेने वाले पार्षद श्यामलाल गुप्त का जन्म 9 सितम्बर 1896 को नरवल गांव में हुआ था। पांच साल की उम्र में इन्होंने परोपकारी पुरुष मुहिम में, पावन पद पाते देखे,उनके सुन्दर नाम स्वर्ण से सदा लिखे जाते देखे, नाम की कविता लिखी थी। असहयोग आन्दोलन में भाग लेने के कारण पार्षद जी को रानी अशोधर के महल से 29 अगस्त 1929 को गिरफ्तार किया गया। जिला कलेक्टर द्वारा उन्हें दुर्दान्त क्रान्तिकारी घोषित करके केन्द्रीय कारागार आगरा भेज दिया गया। 1930 में नमक आन्दोलन के सिलसिले में पुनः गिरफ्तार हुये और कानपुर जेल में रखे गये। पार्षद जी 1931 में और 1942 में फरार भी रहे। 1944में आप पुनः गिरफ्तार हुये और जेल भेज दिये गये। इस तरह आठ बार में कुल छः वर्षों तक राजनैतिक बन्दी रहे।

इंदिरा ने दिया था पद्मश्री अवार्ड
मनोज कपूर ने कि उन्हें झंडा गीत को लेकर पद्मश्री अवार्ड देने के लिए दिल्ली प्रधानमन्त्री कार्यालय से बुलावा आया था। उस समय उनके पास न तो धोती कूर्ता ढंग का था और ना ही उनके पास जूता था। ऐसे में वो वहीं पहनकर दिल्ली चले गए। पार्षद जी का जीवन बैरगी की तरह से था। वो निडर शब्द तैयार करते तो उसी तरह बोलते भी थे। पार्षद जी आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उन्हें लोग कई सदियों तक याद रखेंगे। मनोज कपूर बताते हैं कि उनके पैतृक गांव में एक स्माकर व मूर्ति का निर्माण कराया गया है, जिसका अभी तक शुभारंभ नहीं हुआ। पिछले एक साल से पार्षद की प्रतिमा जनप्रतिनिधि के इंतजार में खड़ा है।

उर्सला में हुई थी मौत, भारत रत्न की मांग
पार्षद जी का निधन 10 अगस्त 1977 को उर्सला अस्पताल में हुआ था। उनके पौत्र साकेत गुप्ता ने बताया कि नंगे पांव घूमने की वजह से उनके दाहिने पैर में कांटा चुभ गया था। जो बाद में बड़ा घाव बन गया। उनदिनों घर की माली हालत खराब होने के कारण अपना अच्छे से इलाज नहीं करा सके। जिंदगी के आखिरी दिनों में इन्हें उर्सला हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था। डॉक्टरों ने उनको एडमिट नहीं किया। इसके चलते 10 अगस्त 1977 को इनकी मौत हो गई। मौत के बाद डॉक्टरों ने उनकी डेडबॉडी को वार्ड से बाहर निकाल कर कैंपस में एक किनारे जमीन पर डाल दिया था। बॉडी को घर ले जाने की कोई व्यवस्था नहीं कराई गई। साकेत कहते हैं कि कई सालों से कानपुर के लोग दादा जी को भारत रत्न दिए जाने की मांग रहे हैं। खुद सीएम योगी आदित्यनाथ से भी हम मिले थे और उन्होंने केंद्र सरकार के पास हमारी बात पहुंचाए जाने का आश्वान दिया था।

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