
इन बच्चों की ये ख्वाहिश है बड़ी, इसलिए जान हथेली पर रखकर जाते हैं पढ़ने, अफसर बेफिक्र
अरविंद वर्मा
कानपुर देहात-कहते हैं कि जब कुछ पाने की ख्वाहिश जेहन में हो तो समुंदर भी छोटा पड़ जाता है। ऐसा ही कुछ आलम कानपुर देहात के संदना गांव का है, जहां शिक्षा ग्रहण करने के लिए नन्हे मुन्ने मासूम बच्चे जान हथेली पर रखकर नदी के पार जाते हैं। दरअसल संदना गांव नदी के एक तरफ बसा हुआ है। इस गांव के लोगों को बाजार हो या स्कूल नदी पार करके ही जाना होता है। तब उनको मंजिल मिलती है। फिर वापस इसी तरह नदी पार करके ही वापस घर पहुंचते हैं। इसके लिए स्कूल जाने वाले नौनिहाल भी नाव पर सवार होकर स्कूल पहुंचते हैं, जो कभी भी जानलेवा साबित हो सकता है। हालांकि बताया जाता है कि कई बार नाव पलटने की घटना हुई और मल्लाह ने इन बच्चों को बचाया है लेकिन कोई सड़क या पुल न होने से बच्चे मजबूरन खतरे को दरकिनार कर अपनी मंजिल की तरफ बढ़ते हैं।
बारिश में होती है ये मसक्कत
बारिश के दरमियान नदी का पानी बढ़ जाता है ओर नदी में नांव चलाना मुमकिन नही होता लिहाज़ा मासूम बच्चे स्कूल जाना बंद कर देते है कई बार तो नदी में नांव भी पलट चुकी है बच्चो के चोटे भी आई है जिससे बच्चे दहशतज़दा होकर के कई हफ्ते स्कूल नही गए लेकिन जुनून पढ़ने का है तो फिर ये बच्चे डर से निकल कर स्कूल जाना शुरू कर देते है ये सिलसिला एक ज़माने से चला आ रहा है लेकिन किसी भी नेता या अधिकारी ने इनकी समस्या को समझना भी उचित नही समझा।
सर्व शिक्षा अभियान का ये है असली रूप
सब पड़े सब बड़े इस स्लोगन की असल परिभाषा देखना है तो कानपुर देहात के संदलपुर ब्लाक के सदना गांव आइये, जहाँ डर के आगे जीत है। जहां बच्चो में पढ़ने का जज़्बा और जुनून है। दरअसल सदना गांव में स्कूल नही है। स्कूल सदना गांव के सामने बह रही नदी उस पार है। लिहाज़ा नन्हे मुन्ने मासूम बच्चे जान जोखिम में डालकर नांव पर सवार होकर नदी उस पार पढ़ने जाते है। मासूम बच्चे दहशतज़दा रहते है लेकिन मजबूर है। कुछ कर भी नही सकते हैं। लिहाज़ा रोज़ाना जान हथेली पर लिए सब पड़े सब बड़े के नारे को ज़िंदा कर रहे है। तमाम नेता आये तमाम अधिकारी आये नाप जोख कर गए लेकिन हालात ज्यों के त्यों हैं।
अभिभावकों की है ये मजबूरी
दरअसल बच्चों के अभिभावक मजबूर है, वो रोज़ अपने बच्चो को ईश्वर से प्रार्थना कर स्कूल भेजते हैं। मानो वो पढ़ने नही जंग लड़ने जा रहे हैं और उनके घर वापस आ जाने तक डरे सहमे रहते हैं लेकिन कर भी क्या सकते हैं। बच्चों का भविष्य भी बनाना है, लिहाज़ा सबकुछ देखकर भी अंजान बने रहते हैं। गांव के लोगो ने तमाम बार अपनी समस्या अधिकारियों से बतायी और नदी पार करने के लिए एक पुल बनाने की मांग की लेकिन नतीजा सिफर निकला चुनाव आते ही वोट मांगने वाले नेता पुल बनवाने की बात को अपने मेनोफेस्टो मे शामिल करने की बात कह कर वोट लेकर चले जाते हैं और दोबारा नज़र नही आते हैं। नेता विधायक सांसद मंत्री बन जाते है और इस गांव के लोग पहले की तरह आदिवासियों वाली ज़िन्दगी गुज़ार रहे है
नौनिहाल बोले यही उद्देश्य है मेरा
एक मासूम बच्चे ने बताया कि उसे नेताओ और अधिकारियों पर भरोसा नही है, लिहाज़ा ये पढ़ाई इस लिहाज से कर रहा है कि पढ़ लिखकर ये अधिकारी बनेगा और सबसे पहले अपने गांव का पुल बनवाएगा। कुछ ऐसी ही ख्वाहिशें गांव के तमाम नौनिहालों की दिलो में हैं। इसलिए ये बच्चे डर को पीछे छोड़ जान जोखिम में डालकर स्कूल पढ़ने जाते हैं। नांव चलाने वाला मल्लाह बताता है कि कई बार नांव पलटी और उसने किस तरह अपनी जान जोखिम में डालकर बच्चों को बचाया। क्योंकि ज़िम्मेदारी उसकी थी, ऐसा नही कि नाविक की कोई तनख्वाह हो, बल्कि 30-35 रुपये रोज़ाना कमा पाता है। कोई दाल, कोई सब्ज़ी नाविक को मेहनताने के रूप में देकर चला जाता है। इस गांव के प्रधान ने तमाम बार अधिकारियों को इस विकट समस्या के बारे में बताया और अधिकारियों से मन्नत मुरादे की कि पुल का निर्माण करा दिया जाए। मुख्यमंत्री तक को फैक्स कर पुल निर्माण की मांग की लेकिन गुज़रते वक्त ने सब कुछ ठंडे बस्ते में डाल दिया।
बोले जिम्मेदार
इस संबंध में ज़िले के जिलाधिकारी से बात की तो उनका कहना था कि आपके माध्यम से मामला संज्ञान में आया है। पहले ये जानकारी की जाएगी कि नदी उस पार जाने का कोई वैकल्पिक रास्ता है कि नही। अगर मासूम बच्चे नांव के माध्यम से स्कूल पढ़ने नदी उस पार जा रहे है तो पुल बनाने के लिए शासन को अवगत कराकर पुल बनाने के लिए प्रयास किया जाएगा।
Published on:
10 Oct 2018 05:54 pm
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