
कानपुर. राजनीतिक दलों के अंदर चुनाव को लेकर उत्साह है तो वहीं मजदूरों के शहर का मिजाज इस वक्त खामोश है। पर जब ये शहर बोला तो बदलाव जरूर हुआ। आपातकाल के बाद कांगेस का हाल बेहाल था, तब 1978 में इंदिरा गांधी ने यहीं से हुंकार भरी और दोबारा प्रधानमंत्री बनीं। पहलवानी के माहिर खिलाड़ी मुलायम सिंह ने राजनति में कदम रखा तो कानपुर को अपना अखाड़ा बनाया। मजदूरों के शहर ने इन्हें 1989 में जिताकर लखनऊ की गद्दी पर बैठाया। राममंदिर आंदोलन के दौरान यहीं से भाजपा को धार मिली और सूबे से लेकर दिल्ली में कमल की सरकार बनी। अक्टूबर-2013 में हुई पहली विजय शंखनाद रैली ने मोदी का रास्ता यूपी में खोला और पार्टी को जबर्दस्त जीत मिली। डीएवी कॉलेज के प्रोफेसर अनूप सिंह कहते हैं कि सेंट्रल जोन में होने के कारण कानपुर से पूरे यूपी को मेसेज देना आसान होता है। इसलिए नेता इसे पसंद करते हैं और मजदूरों के कदम जिस दल की तरफ बढ़ते हैं वहीं सरपंच की कुर्सी पर बैठता है।
इंदिरा से लेकर मोदी तक
यूपी के सबसे बड़े शहर कानपुर में एक जमाने में मजूदरों का बोलबाला रहा है। यह शहर प्रदेश के बिलकुल बीच में होने के कारण यहां दिया गया मेसेज पूरे प्रदेश में आसानी से पहुंचता है। यहां से हर पार्टी को एक किस्म की एनर्जी मिलती है। अगर यहां कोई रैली या सभा कामयाब होती है, तो पार्टी अपने आने वाले दिनों का अनुमान आसानी से लगा लेती है। प्रोफेसर अनूप सिंह बताते हैं कि आपातकाल के बाद पूरे देश में कांग्रेस की स्थित बहुत खराब थी। कानपुर के अधिकतर मजदूर यूनियन के बड़े संगठन पार्टी से दूरी बना ली थी। तब कांग्रेस के नेताओं ने मजदूरों के शहर में इंदिरा गांधी की रैली कराए जाने का एलान किया। 19 सितंबर 1978 को इंदिरा गांधी फूलबाग में रैली की। रैली में इतनी भीड़ जुटी थी कि लोग पेड़ों पर चढ़कर इंदिरा को सुन रहे थे। इस रैली का ही असर था कि पूरे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए जोरदार माहौल बना और 1980 में कांग्रेस दोबारा सरकार में लौटी। इसके बाद लंबे वक्त तक सियासत खामोश रही।
90 के दशक में कमल के साथ खड़ हो गया कानपुर
भारतीय जनता पार्टी सत्ता पाने के लिए संधर्ष कर रही थी। 90 के दशक में राम लहर आई और कानपुर बड़े आंदोलनों का गवाह बना। यहां से सैकड़ों की संख्या में स्वयंसेवक अयोध्या के लिए कूच किए थे। बाबरी विध्यवंस के बाद कानपुर भाजपा का गढ़ बन गया। लेकिन 2004 में कानपुर फिर से कांग्रेस के साथ खड़ा हो गया और शहर व देहात में पंजा विजयी हुआ। दिल्ली में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में सरकार बनी जो 2014 तक चली। लेकिन 19 अक्टूबर 2013 को कल्यानपुर इलाके में बीजेपी के पीएम कैंडिडेट नरेंद्र मोदी की यूपी में पहली रैली हुई। यूपी में चुनाव प्रचार की यह औपचारिक शुरुआत थी। रैली में भारी भीड़ जुटी। इससे राजनीतिक जानकारों ने अनुमान लगा लिया था कि कहीं न कहीं वोटरों के मन में कुछ चल रहा है। मतदान के बाद परिणाम आया और नरेंद्र मोदी के हाथों में देश की सत्ता आ गई।
इन नेताओं ने कानपुर से किया चुनाव का आगाज
प्रोफेसर अनूप सिंह के अनुसार नरेंद्र मोदी को ही जवाब देने के लिए दो मार्च 2013 को आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल ने यूपी की पहली रैली कानपुर में की। इस रैली में ही केजरीवाल ने आम लोगों से वाराणसी से लड़ने के बारे में पूछा था। इसके अलावा 2004 में अटल बिहारी वाजपेई और 2009 में लालकृष्ण आडवाणी ने भी लोकसभा चुनाव प्रचार का बिगुल कानपुर से ही फूंका था। 2007 के विधानसभा चुनाव की कैंपेनिंग की शुरुआत सोनिया गांधी ने परिवर्तन रैली कर कानपुर से ही की थी। प्रोफेसर अनूप सिंह कहते हैं यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव ने 2012 विधानसभा चुनाव का आगाज कानपुर से साइकिल यात्रा निकाल कर किया। नतीजा ये रहा कि शहर के साथ सूबे की जनता ने इन्हें पसंद कर लिया और सीएम की कुर्सी पर बैठा दिया। 2017 के समर में उतरने से पहले अमित शाह ने रूमा में संगठन से जुड़े करीब बीस हजार कार्यकर्ताओं के साथ बैठक कर यूपी फतह कर पटकथा लिखी थी।
Published on:
04 Nov 2017 08:37 am
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