
कानपुर में कोलकाता की तर्ज पर चलेगी मेट्रो, टे्रन के ऊपर नहीं होगी बिजली की लाइन
कानपुर। शहर में चलने वाली मेट्रो को कोलकाता मेट्रो की तर्ज पर चलाया जाएगा। इसमें खास बात यह होगी कि मेट्रो में ओवर हेड इलेक्ट्रिक (ओएचई) लाइन नहीं होगी। मेट्रो को तीसरी पटरी (थर्ड रेल) के सहारे बिजली मिलेगी। इससे यात्रा सुरक्षित होगी और ओएचई का खतरा नहीं होगा। यूपीएमआरसी के चीफ प्रोजेक्ट इंजीनियर अरविन्द सिंह का कहना है कि इस तकनीक में खतरे कम होते हैं। साथ ही तकनीकी खराबी के समय इसे ठीक करना भी आसान होता है।
क्या है थर्ड रेल
मेट्रो में पावर सप्लाई के लिए दो तरीके हैं। पहला है ओएचई का, जिसका प्रयोग आम ट्रेनों के लिए भी किया जाता है। दिल्ली समेत देश के कई शहरों में मेट्रो में भी इसी का इस्तेमाल होता है। दूसरा तरीका है थर्ड रेल का। इसमें ट्रेनों की पटरियों के बराबर या बीच में एक और पटरी बिछाई जाती है। इसे कंडक्टर रेल भी कहते हैं। इसी में करंट प्रवाहित होता है। देश की पहली मेट्रो रेलवे, कोलकाता में पावर सप्लाई के लिए थर्ड रेल का ही इस्तेमाल किया जा रहा है। वहां यह मेट्रो की दाहिनी पटरी के समानांतर बिछाई गई है।
पूरी तरह सुरक्षित है थर्ड रेल
थर्ड रेल पर सिरेमिक इंसुलेटर लगाए जाते हैं, ताकि कोई इसके सम्पर्क में आ भी जाए तो उस पर करंट का प्रभाव न पड़े। जबकि मेट्रो में करंट के लिए ट्रेन में धातु (मेटल) का एक कॉन्टैक्ट ब्लॉक होता है, जिसे कलक्टर शूज (कॉन्टैक्ट शूज) कहा जाता है। यह कलक्टर शूज उसी तरह से थर्ड रेल के संपर्क में रहता है, जैसे आम ट्रेनों के इंजन का पेंटो ओएचई से रगड़ता रहता है। कलक्टर शूज के साथ एक सहूलियत और होती है कि इसका संपर्क थर्ड रेल के ऊपर, नीचे या फिर बराबर में कहीं से भी किया जा सकता है।
यूपी की ऐसी पहली मेट्रो कानपुर में
आईआईटी से मोतीझील तक पहले फेज में तीसरी पटरी से पावर सप्लाई का प्रोजेक्ट तैयार है। मेट्रो रेल कॉरपोरेशन ने जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज में 16 मीटर और हैलट अस्पताल में 13.2 मीटर चौड़ाई में जगह लेने का अंतिम प्रस्ताव कॉलेज प्रशासन को दे दिया है। लिक्विड ऑक्सीजन के प्लांट की एनओसी भी देने का प्रस्ताव दिया है। दो महीने में जगह लेकर मेडिकल कॉलेज और हैलट की बाउंड्री अलग बनाई जाएगी।
Published on:
06 Oct 2019 12:05 pm
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