
दस साल से विवादित इस मस्जिद में एक बार भी नहीं हुई नमाज, इस कारण पड़ा है ताला
कानपुर। सुप्रीमकोर्ट के फैसले के बाद विवादित चला आ रहा अयोध्या का मंदिर-मस्जिद मामला हल हो गया और मुस्लिम समाज में इसकी मिली जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली। ज्यादातर लोगों ने फैसले पर संतोष जताया तो कुछ ने इसे लेकर अपनी अलग राय पेश की। लेकिन शहर की एक मस्जिद ऐसी भी है जिस पर कोई मंदिर का विवाद नहीं, फिर भी दस साल से इस पर ताला पड़ा हुआ है। मस्जिद बनने के बाद अब तक इसमें एक बार भी नमाज नहीं पढ़ी गई। यह है तलाक महल की बिलाल मस्जिद। यह एक ऐसी मस्जिद है, जिसका मालिकाना हक भी मुस्लिमों के पास है लेकिन इस पर ताला भी मुसलमानों ने डाल दिया है।
यह है मस्जिद में विवाद की जड़
10 साल पहले 2009 में रमजान के जुमा अलविदा को इसमें नमाज शुरू होनी थी, लेकिन मस्जिद पर नियंत्रण और इमाम बरेलवी या देवबंदी विचारधारा को लेकर बात फंस गई। मामला जिला प्रशासन तक पहुंच गया। तब से आज तक इस मस्जिद का ताला न खुलने के पीछे मूल जड़ बरेलवी-देवबंदी विवाद है। इस मस्जिद का निर्माण सऊदी अरब में रहने वाले इकराम उल्ला (मूल निवासी तलाक महल) ने अपनी वसीयत में कराने को कहा था। उनके तीन पुत्रों में एक फजल ने तलाक महल में पड़ी अपनी पुश्तैनी जमीन पर मस्जिद बनवाने को लेकर कोशिशें कीं। यहां पर विधायक इरफान सोलंकी के चाचा इकबाल सोलंकी ने मस्जिद निर्माण में मदद की।
निर्माण होते ही खड़ा हो गया मसला
मस्जिद निर्माण के बाद तय किया गया कि इसे बनवाने वाले फजल देवबंदी विचारधारा के हैं, उनकी पुश्तैनी जमीन पर मस्जिद बनी है तो कमेटी और इमाम उनकी विचारधारा का होगा। जबकि, इसमें मदद करने वाले इकबाल सोलंकी और अन्य लोग यहां पर बरेलवी मसलक का इमाम रखना चाहते थे। इस मामले से जुड़े रहे ऑल इंडिया सुन्नी उलेमा काउंसिल के महासचिव हाजी मोहम्मद सलीस ने बताया कि बाद में मामला निपटाने की कोशिश हुई।
निकाला गया यह हल
यह तय हुआ कि कमेटी देवबंदी और इमाम बरेलवी विचारधारा का होगा। न यहां पर देवबंदी विचारधारा से प्रभावित गैर जनपद या विदेशी जमात रुकेगी और न ही बरेलवी विचारधारा से संबंधित नमाज के बाद सलाम होगा। फार्मूला दिया गया था कि बरेलवी इमाम के पीछे देवबंदी नमाज पढ़ लेते हैं तो कोई परेशानी नहीं होगी।
Published on:
24 Nov 2019 01:59 pm

