
कानपुर। कर्नाटक विधानसभा चुनाव प्रचार से लेकर सरकार के गठन तक जमकर सियासत हुई। कोई भी दल पीठे हटने को तैयार नहीं। पूर्ण बहुमत न होने के बावजूद राज्यपाल ने अपने विवेक इस्तेमाल करते हुए सबसे बड़े दल भाजपा को सरकार बनाने का न्योता देरशाम दे दिया। गुरूवार को कर्नाटक के 25 वें मुख्यमंत्री की शपथ बीएस येदियुरप्पा ने ली। पर उनके लिए आगे की डगर काटों भरी हो सकती हे। सुप्रीम कोर्ट ने 24 घंटे के अंदर अपने विधायकों की संख्या बताने का आदेश दिया है, जिससे 20 साल पहले यूपी की कहानी सिर्फ याद दिला दी हैं। कोर्ट के आदेश के बाद उस वक्त के सीएम जगदंबिका पाल को इस्ताफा देना पड़ा था और मुख्यमंत्री की कुर्सी कल्याण सिंह को मिली थी।
वन डे वंडर ऑफ इंडियन पॉलिटिक्स नाम पड़ा
जगदंबिका पाल का जन्म 21 अक्टूबर 1950 को हुआ था। उन्हें ’वन डे वंडर ऑफ इंडियन पॉलिटिक्स’ कहा जाता है। 13वीं विधानसभा की यह घटना इतिहास के पन्नों में काले हर्फों में दर्ज है। वह राजनीति के मजे हुए खिलाड़ी माने जाते हैं। लंबे समय तक कांग्रेस में रहने के बाद साल 2014 में उन्होंने बीजेपी का दामन थाम लिया और सांसद चुने गए। 21-22 फरवरी 1998 को दल-बदल की वजह से बहुमत साबित करने के दौरान यूपी विधानसभा में जमकर मारपीट हुई। इसे देखते हुए तत्कालीन गवर्नर रोमेश भंडारी ने केंद्र से यूपी में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश कर दी। लेकिन, केंद्र ने इससे इंकार कर दिया। इससे उत्साहित होकर कल्याण सिंह ने बाहर से आए विधायकों को मंत्री बना कर देश के इतिहास में यूपी का सबसे बड़ा मंत्रिमंडल बना दिया। इसमें 93 मंत्री रखे गए। वहीं, इससे नाराज दूसरे राजनीतिक दलों ने कल्याण सरकार का तख्ता पलट करने की योजना बना ली। कल्याण सिंह को उस समय झटका लगा जब बसपा से आए विधायकों के सपोर्ट को गवर्नर रोमेश भंडारी ने मान्यता देने से इंकार कर दिया। इसके बाद उन्होंने रातों-रात कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त कर दिया। इतना ही नहीं उन्होंने जगदंबिका पाल को सीएम पद की शपथ दिलवा दी।
अटल जी को धरने पर बैठना पड़ा
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी गवर्नर के इस फैसल के खिलाफ अनशन पर बैठ गए। वहीं, कल्याण सिंह के समर्थक हाईकोर्ट पहुंच गए। हाईकोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए गवर्नर के आदेश पर रोक लगा दी। इसके बाद उन्होंने कल्याण सिंह की सरकार को बहाल कर दिया। डीएबी कॉलेज के राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर अनूप सिंह बताते हैं कि उस दिन सीएम ऑफिस में दो सीएम को पहुंचना था। सभी लोग सुबह से ही इसका इंतजार कर रहे थे। इस दौरान सबसे पहले जगदंबिका पाल सीएम ऑफिस पहुंचे। इसके बाद कल्याण सिंह भी वहां पहुंच गए। इसे देख कर सचिवालय कर्मियों में भी असमंजस की स्थिति बनी हुई थी। कहते हैं कि चौतरफा पड़ रहे दबावों से घबराए जगदंबिका पाल ने गृह मंत्रालय को फोन करके अपनी जान का खतरा भी बताया था। इस बीच वह सीएम की कुर्सी पर बैठे हुए थे, तभी उनके पास हाईकोर्ट के आदेश की कॉपी पहुंची। इसके बाद उन्होंने सीएम ऑफिस छोड़ दिया और वहां से निकल गए।
एक साथ यूपी के दो सीएम थे बैठे
ज्गदंबिका पाल के इस्तेफा के बाद फिर विधानसभा में कल्याण सिंह को चुनौती मिली। उन्हें बहुमत साबित करना था। प्रोफेसर अनूप सिंह ने बताया कियह वह दिन था जब विधानसभा अध्यक्ष केसरीनाथ त्रिपाठी के अगल-बगल यूपी के दो सीएम बैठे थे। आखिरकार एक बार फिर कल्याण सिंह ने अपना बहुमत साबित कर दिया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे मान्यता दे दी थी। प्रोफेसर अनूप सिंह कहते हैं कि वही हालात लगभग-लगभग कर्नाटक बनते दिख रहे हैं। यदि येदियुरप्पा कोर्ट के समक्ष विधायकों की संख्या लेकर नहीं पहुंचते तो हो सकता है कि कोर्ट उन्हें बर्खास्त कर दे। पूर्व विधायक संजीव दरियाबादी कहते हैं कि भाजपा ने संविधान का पूरी तरह उल्लंघन किया है और कोर्ट ने उन्हें सिर्फ शपथ लेने की मंजूरी दी है। येदियुरप्पा को 24 घंटे के अंदर विधायकों की संख्या कोर्ट को बतानी होगी। अगर वह ऐसा नहीं कर पाए तो यूपी की 20 साल पहले की कहानी कर्नाटक में दोहराई जा सकती है।
कोर्ट को सौपनी है विधायकों की लिस्ट
बुधवार-गुरुवार रात सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कोर्ट ने बीजेपी और कांग्रेस और जेडीएस खेमे की सारी दलीलें सुनी। इसके बाद कोर्ट ने बीजेपी को तय कार्यक्रम के तहत शपथ ग्रहण समारोह कराने की इजाजत दे दी। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने बीजेपी से कहा कि कांग्रेस और जेडीएस ने 117 विधायकों के समर्थन की लिस्ट सौंप दी है, ऐसे में आपके पास 112 विधायक कहां से आएंगे. इस पर बीजेपी के वकील कोर्ट से समय की मांग की। सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस और जेडीएस की याचिका पर कनार्टक सरकार तथा येद्दियुरप्पा को नोटिस जारी करते हुए इस पर जवाब मांगा है और मामले की सुनवाई के लिए शुक्रवार की तारीख तय की है। अगर शुक्रवार को बीजेपी सुप्रीम कोर्ट में बहुमत के आंकड़े के बराबर विधायकों की लिस्ट नहीं सौंप पाते हैं तो बीएस येदियुरप्पा की कुर्सी पर खतरा हो सकता है। हालांकि कोर्ट ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि बहुमत की चिट्ठी नहीं सौंप पाने पर आगे का कदम क्या होगा। इस पर प्रोफेसर अनूप सिंह कहते हैं कि कोर्ट के पास यदि आंकड़े येदियुरप्पा नही दे पाए तो उन्हें हटाया भी जा सकता है।
Published on:
17 May 2018 01:56 pm
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