
इस राजा ने सरकारी खजाना लूटकर अंग्रेजों को खदेड़ा था गंगा पार
कानपुर देहात-ग़दर का दौर था, चारो तरफ वतन को आज़ाद कराने की हुंकार सुनाई दे रही थी। अंग्रेजों का अत्याचार चरम पर था, भारतीय पुरुष महिलाएं अत्याचारियों के चंगुल से मुक्त होने की गुहार लगा रहे थे। तब क्रांतिकारियों में ज्वाला फूट पड़ी थी। एक तरफ अंग्रेज राजाओं के खजाने पर अधिकार जमाने के लिए हमला बोल देते थे और लूटपाट कर आर्थिक रूप से मजबूत हो रहे थे। उस दौरान राजा दरियावचंद्र ने अहभ भूमिका अदा की। भले ही लोग दरियावचंद्र का इतिहास कहानी समझकर भूल गए हो लेकिन उनकी वीरान जर्जर हवेली आज भी दास्तां सुनाती है। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम मे तमाम वीर सपूत शहीद हो गए, लेकिन शुक्र है कि समय-समय पर आने वाले राष्ट्रीय पर्वाे पर कम से कम उन सपूतो का स्मरण तो किया जाता है। दिन गुजरते ही लोग उनकी शहादत को भले ही भूल जाये, लेकिन उनकी निशानियों के रूप मे प्राचीन खंडहर हवेलियां व ध्वस्त किले आज भी उनकी वीर गाथायें सुनाते है।
1857 संग्राम में अंग्रेजों के खिलाफ खोल दिया मोर्चा
18वीं सदी का समय था। तक्षशिला के एक राजा नार ऋषिदेव थे, जिन्होने रसूलाबाद व झींझक के मध्य रिंद नदी के किनारे एक नगर की स्थापना की थी। जिसे नार कालिंजर नाम से जाना जाता था। उस समय के लाल पत्थरो से राजा दरियावचंद्र ने एक विशाल किले का निर्माण कराया था, जिसमे बडे बडे हाल व बारादरी बनवायी गई थी। किले के समीप से गुजरती रिंद नदी के तट पर अक्सर राजा बिहार करने जाते थे और किले मे राजा चौपाल लगाकर नगर के लोगो की समस्यायें सुना करते थे लेकिन अंग्रेजी सेना के घोड़ों की टापें दरियावचन्द्र को परेशान किया करती थी। जिसको लेकर उनके मन मे क्रांति की ज्वाला भड़क रही थी। जो 1857 के संग्राम मे फूट गयी। तब गौर राजा दरियावचंद्र के नेतृत्व में रियासतदारों व हजारों क्रान्तिकारियों ने अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया लेकिन अंग्रेजो की सरफरस्ती के चलते लोगो के पास हथियार जुटाने के लिये धन नही था।
फिर अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लटका दिया फांसी
धन के लिए राजा ने अंग्रेजो के आधीन रसूलाबाद तहसील का सरकारी खजाना लूट लिया और अंग्रेजी सेना को गंगा पार तक खदेड़ दिया था। 10 नवम्बर से 28 नवम्बर के बीच इन 18 दिनों की जंग में अंग्रेजी सेना से लड़ने के दौरान कई क्रांतिकारी शहीद हो गए, जो आज भी गुमनामी के अंधेरे में है। अंग्रेज टूटने लगे थे तो उन्होंने नेतृत्व कर रहे राजा दरियावचंद्र को गिरफ्तार करने की ठान ली। विद्रोह के थमने पर अंग्रेज हुक्मरानों ने राजा दरियावचंद्र को गिरफ्तार कर लिया और धर्मगढ परिसर मे खड़े नीम के पेड से लटका दिया। जिसके बाद अंग्रेजो ने उनकी रियासत को जब्त करके खानपुर डिलबल के पहलवान सिंह को सौंप दी थी। जो आज भी राजा दरियावचन्द्र की कुर्बानी का किस्सा ये पुराना किला बयां करता है।
Published on:
07 Jun 2018 03:24 pm
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