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कानपुर. गंगा किनारे बसे बिठूर कस्बा एतिहासिक, धार्मिक के साथ ही पौराणिक स्थलों में से एक है। यहीं पर ब्रम्हा ने सृष्ठि की रचना की थी तो वाल्मीकि ने रामायण ग्रंथ लिखा था। लव-कुश के साथ राजा ध्रुव की जन्मस्थली में ही झांसी की लक्ष्मीबाई ने यु़द्ध की कला सीखी थी। पर ये कस्बा एक बार फिर सुर्खियों में है, क्योंकि ध्रुव ने अपने टीले को बचाने के लिए पूरे सात साल आदालत में लड़ाई लड़ी। जज ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जमीन पर मालिकाना हक का दावा करने वाले कारोबारी के खिलाफ फैसला सुनाते हुए ध्रुव टीले को पुरातत्व विभाग के हवाले कर दिया। इसकी खबर जैसे ही वहां के रहवासियों को हुई तो वो खुशी से झूम उठे। लोगों ने कहा कि राजा ध्रुव का जन्म बिठूर में हुआ था और टीले पर खड़े होकर उन्होंने तप किया था। उसकी कई निशानियां आज भी यहां मौजूद हैं।
क्या था पूरा मामला
बिठूर निवासी मधुकर राव मोघे ने अपर लघु वादी न्यायधीश की कोर्ट में 27 मार्च 2017 को एक याचिका दायर की थी। जिसमें मोघे ने कहा था कि ध्रुव टीले वाली 64 की 1229 हेक्टेयर रकबा की जमीन उनके पूर्वजों की है और परिवार इसे जोतता आ रहा है। मोघे ने आरोप लगाया था कि जमीन पर अब भारतीय पुरातत्व विभाग ने कब्जा कर रखा है।
पुरातत्व विभाग ने दीवार खड़ी कर दी। जनवरी 2009 में लेंटर भी डाल दिया गया। मोघे ने यह जमीन पर काम रोककर कब्जे से मुक्त कराने का आदेश देकर न्याय दिलाया जाए जाने की मांग की थी। जिसका विरोधं भारतीय पुरातत्व विभाग ने कर न्यायालय में अपना पक्ष रखा। दोनों जरफ की दलीलें सुनने के बाद जज ने जमीन पर हक पुरातत्व विभाग का बताकर वादी की दायर याचिका को निरस्त कर दिया।
7 साल तक लंबी चली लड़ाई
पुरातत्व विभाग ध्रुव टीले की जमीन पाने के लिए पूरे सात साल तक लंबी लड़ाई लड़ी। इस मामले में पुरातत्व विभाग ने तर्क दिए कि यह स्थल ध्रुवटीला बिठूर के नाम से प्रसिद्ध है। यह केंद्र सरकार की संरक्षित इमारत है। यह भाग नोटिफिकेशन के जरिए राष्ट्रीय महत्व स्थल घोषित हो चुका है। गलत तथ्यों के आधार पर यह याचिका दायर की गई है। अपर लघुवाद न्यायाधीश ने अभिलेखीय और मौखिक साक्ष्य के आधार पुख्ता नहीं आए। प्रथम दृष्टया अपर लघुवाद न्यायाधीश ने मामला खारिज कर दिया। वादी ने स्पेशल जज ई.सी.एक्ट की अदालत पर फिर से न्याय की गुहार की। इस मामले में एक बार फिर दोनों पक्षों को सुना गया। न्यायाधीश ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद याचिका खारिज कर दी। इस बार भी आधार वादी के दावे से जुड़े साक्ष्य न होने ही बना।
1822 में मिले थे ताम्र
मान्यता है कि ध्रुवटीला राजा उत्तानपाद के राजकाल के दौरान का है। यहां ही ध्रुव का जन्म हुआ। 1822 में पुरातात्विक साक्ष्य के रूप में यहां से ताम्र (तांबा) आयुध यहां से बरामद हो चुके हैं। यहां से मिले हथियारों में तांबे का बड़े आकार का फाल या कुल्हाड़ा, खड्ग, कांटेदार बरछी, भाला भी शामिल है। तांबे के गोलाकार छल्ला और पत्थर काट बनी तांबें की आकृतियां भी यहां से मिल चुकी है।
ये सभी ऐतिहासिक धरोहरें कोलकाता, लखनऊ और प्रयाग के संग्रहालय में संरक्षित हैं। इन हथियारों का काल लगभग 2500-200 वर्ष ईसवी पूर्व का माना जाता है। विद्वानों का मत है कि यह स्थान उससे भी पूर्व का है। पुरातत्व विभाग ध्रुव टीला को संरक्षित कर रहा है। यहां पर चारों ओर बाउंड्री बनाने की योजना पहले ही पास हो चुकी है। यह काम रुक गया था। लगभग दो करोड़ रुपए से यहां बाउंड्री वाल बननी है।
Published on:
12 Nov 2017 09:15 am
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