
विनोद निगम
कानपुर. महाभारत युद्ध के दौरान भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का पाठ सुनाया था। इसी के बाद कौरवों पर पांडवों की जीत हुई। इसी से प्रेरणा लेते हुए चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (सीएसए) के एसोसिएट प्रोफेसर डॉक्टर केशव प्रसाद सरस ने किसानों के लिए एक कृषि ग्रन्थ तैयार किया है। प्रोफेसर ने रबी, खरीफ व जायद में होने वाली 34 फसलों को दोहों व चौपाइयों में बांधकर खेती का मंत्र इस ग्रन्थ के जरिए दिया है। 116 पेज की पुस्तक ’कृषि गीता’ में उन्होंने फसलों की बुआई, कटाई, उन्नत बीजों का इस्तेमाल, कीटों व जलवायु परिवर्तन की मार से फसलों को बचाने के तरीके बताए हैं। प्रोफेसर बताते हैं, मौसम की मार के कारण अक्सर किसानों की फसले बर्बाद हो जाती है जिससे किसान आत्महत्या तक कर लेते हैं। इससे निजाद दिलाने के लिए उन्होंने ये ग्रन्थ लिखा है, इसे किसान पढ़कर फसलों को तो बचाएंगे साथ ही उन्हें अन्य ज्ञान भी होगा।
116 पेजों की है कृषि गीता
एसोसिएट प्रोफेसर डॉक्टर केशव प्रसाद सरस सीएसए में छात्रों को कृषि की शिक्षा से दक्ष करने के साथ ही किसानों की फसलों के लिए उन्नत किस्म के यंत्र तैयार करते हैं, लेकिन इन्होंने एक नया कारनामा कर लोगों का दिल जीता है। डॉक्टर केशव प्रसाद सरस ने फसलों को बचाने के लिए 116 पेजों के कृषि ग्रन्थ की रचना की है। प्रोफेसर ने इस ग्रन्थ को दोहों और चौपाईयों से गढ़ा है। किसानों को फसल को कब बोना, काटना चाहिए, कीटों से बचना, सूखे के दौरान क्या करना चाहिए, अधिक बारिश हो जाए तो फसल को किस विधि से बचाया जाए, ये सब दोहों के जरिए गढ़ा है। प्रोफेसर ने बताया कि एक दशक से ज्यादा समय से हमारे देश में जलवायु परिवर्तन होने के चलते इसकी मार कृषि पर पड़ी और फसलों के नुकसान होने के चलते किसानों की खुदकुशी की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। इस कृषि ग्रन्थ में किसानों को हर जानकारी मिलेगी, जिससे वो अपनी फसल को बचा सकेंगे।
1987 में लिखनी शुरू की थी कृषि ग्रन्थ
डॉक्टर केशव प्रसाद सरस बताते हैं कि ’कृषि गीता’ पुस्तक लिखने में उन्हें दो साल का समय लगा। 1987 में उन्होंने इस पुस्तक को लिखना शुरू किया था। 1989 में यह पूरी हो गई, जबकि 1994 में इसे आइसीएआर ने मंजूरी दी। इसमें करीब 300 दोहे व व 1425 चौपाइयां हैं। सीएसए में एसोसियेट प्रोफ़ेसर डॉक्टर केशव प्रसाद सरस की दोहो और चौपाइयां से रचित कृषि गीता को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने प्रकाशित किया है। साथ ही प्रोफेसर डॉ. केशव प्रसाद सरस को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी की अध्यक्षता में तुलसी नामित पुरस्कार प्रदान किया जा चुका है। उत्तर प्रदेश के हिंदी संस्थान लखनऊ की ओर से उन्हें यह पुरस्कार अवंतीबाई महाकाव्य की रचना करने के लिए भी प्रदान किया गया है। डॉक्टर केशव बताते हैं कि जब वो कक्षा दसवीं के छात्र थे, तब हमें दोहा व चौपाई लिखने की प्रेरणा भारत व बांग्लादेश के बीच हुए युद्ध के दौरान मिली। 15 साल की उम्र में इन्होंने पहली कविता ’मां की पुकार’ लिखी थी।
रवि की जब कट जाए, खेत तैयारी में जुट जाए’
प्रो. सरस के काव्य में धान की रोपाई के बारे में ’फसल रवि की जब कट जाए, खेत तैयारी में जुट जाए’ व कृषि विविधीकरण को लेकर ’तिनकुड़िया खेती करो आलू-राई साथ, उत्पादकता नहीं घटे लगाकर देखो हाथ’ जैसे दोहे शामिल हैं। इसके अलावा इस पुस्तक में कृषि पर आधारित ’बीज शोधन के लिए रस आयन उपयुक्त, कृषि वैज्ञानिक कृषक जन करिए सदा प्रयुक्त’, ’शुद्ध प्रमाणित बीज से उत्पादन बढ़ जाए, पूर्व बीज शोधित नहीं शीघ्र शोधिए भाय’, ’जल 45 लीटरोह इन्हें डालिए घोल, बीज पचीसोह किलो को इसमें डालो तोल’, ’12 घंटे तक इन्हें रखिए घोल भिगोय, ताके बाद निकालकर खेतोह बीजे बोए’, ’रोपाई के बाद जो पौध नष्ट हुई जाय, खाली जगह तुरंत भर कमी न रहने पाए’, ’वर्ग एक मीटरोह में चार सौ बाली होए, कमी पड़े नहीं अन्न की उपज अधिकतम होए’ जैसे दोहे व चौपाइयां शामिल हैं।
Updated on:
06 Aug 2017 11:44 am
Published on:
06 Aug 2017 09:48 am
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