कानपुर। बिल्हौर तहसील क्षेत्र के मकनपुर स्थित सैय्यद बदीउद्दीन जिंदा शाह मदार की दरगाह पर दम मदार बेड़ा पार की गूंज के साथ 602 वां उर्स की शुरुआत हो गई। करीब दो लाख अकीदतमंद यहां पर पहुंच चुके हैं । उर्स में जायरीनों और मलंगों के आने और दरगाह में मत्था टेकने और चादर चढ़ाने की सिलसिला जारी हो गया है। डीएम विजय विश्वास पन्त और एसएसपी अनंत देव तिवारी भी बाबा के दर पर जाकर माथा टेका। यहां पर सैकड़ों साल पुरानी चीज मौजूद हैं, जिन्हें लोग देख गदगद हैं। इन्हीं में से हजरत का एक प्लाया है, जो सांइटिस्ट का दुनिया के लिए पहले बना हुआ है। बताया जाता है कि यदि किसी खाने में यदि जहर मिला हो तो उसे इसमें रखते ही उसका रंग बदल जाता है। ऐसे कई नायब समान यहां पर लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बनें हुए हैं।
282 हिजरी में रखी थी नींव
मकनपुर स्थित सैय्यद बदीउद्दीन जिंदा शाह मदार की दरगाह पर अकीदतमंदों के आने का सिलसिला शुरू हो गया है। दो दिन के अंदर दो लख जायरीन यहां पहुंच चुके हैं और बाबा के दरगाह पर माथ टेक अमन-चैन की दुआ मांग रहे हैं। कमेटी के सदस्य मजाहिर हुसैन ने बताया कि भारत में मेले का इतिहास काफी पुराना रहा है। यह मेले हिंदुस्तानी सभ्यता का हिस्सा रहे हैं, जिसमें सबसे अहम कुंभ का मेला है। इन मेलों को तरक्की हजरत जिंदा शाह मदार के हिंदुस्तान में आने के बाद मिली और मेला के साथ मदार नाम जुड़ा। आम बोलचाल में लोग आज भी मेला मदार जाने का जिक्र करते हैं। उन्होंने बताया कि हजरत जिंदा शाह मदार लगभग 282 हिजरी में भारत पहुंचे और भारत भ्रमण के बाद मकनपुर शरीफ आए थे। मकनपुर में मदार साहब के दुनिया से पर्दा कर जाने के बाद शर्की हुकूमत के दौर में दरगाह का निर्माण किया गया। इसके बाद मदार साहब को मानने वाले लोग मकनपुर पहुंचने लगे और मेलो का दौर शुरू हो गया।
आज तक नहीं कर पाए खोज रहस्य
जिंदा शाह की मदार में ऐसे-ऐसे समान रखें हैं, जिन्हें देखनें और शोध करने के लिए साइंटिस्ट पहुंचते हैं, पर रहस्यों के बारे में आजतक पर्दा नहीं उठा पाए। प्रोफेसर मजहर अब्बास नकवी यहां पिछले तीन दशक से शोध कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि मकनपुर शरीफ में जनाब अकदस लंबे समय से यहां की नयाब चीजों को सुरक्षित रखे हुए हैं। इसमें मदार साहब के व्यक्तिगत इस्तेमाल का एक प्याला भी है। जिसकी खासियत यह है कि वो जहर को पहचान लेता है। बताते हैं कि यदि खाना और पानी में जहर मिला हो और उसे प्याले में रखते ही रंग बदल जाता है। कई सांइटिस्टों ने इस पर शोध किया लेकिन इस रहस्य से कभी उजागर नहीं कर पाए।
जड़ी-बूटियों के जरिए इलाज
बद्उद्दीन जिंदाशाह मदार की दर पर देव भूमि उत्तराखंड सहित हिमालय से कई प्रकार की अनोखी चीजें भी सजकर जायरीनों के आकर्षक का केंद्र बनी हुई हैं। जड़ी-बूटी सहित कई प्रकार की औषधीय फूल-पत्ती भी मदार साहब के करम से जायरीनों की पुरानी मर्जों को खत्म कर रही हैं। यहीं कारण है कि मकनपुर मेले में दूर-दूर से बैध, हकीमों की कई दुकानें सजी हुई हैं। बुर्जुग वैध गोपाल सिंह ने बताया कि उनके पिता भी मकनपुर आकर लोगों का इलाज किया करते थे। वह भी बीते 30 सालों से मकनपुर आकर मदार साहब की खिदमत में लगे हैं। उन्होंने बताया कि उनकी दुकान में जड़ी बूटी के माध्यम से कई प्रकार के लाइलाज मर्ज चुटकी में छूमंतर हो जाते हैं। इन औषधियों से पेट के कई विकार, खाज-खुजली, नजर कम होना, फुड़ियां-फुंसी, बालों का सफेद होने की अचूक दवाएं उनके पास हैं।
लोभान जलते ही मच्छर छू मन्तर
मकनपुर मेले में बड़ी संख्या में लोभान की दुकान भी लगी है। मदार की दर पर माथा टेकने वाले अधिकाश जायरीन अपने घरों में विविध रश्म अदायगी और पूजा पाठ के लिए बड़ी संख्या में लोभान लेकर जाते हैं। मकनपुर तीन पीढ़ियों से लोभान की दुकान सजाने वाले बहराइच के सईद, फारुख और राशिद ने बताया कि लोभान खुशबू दार लकड़ी होती है। इसको कई प्रकार की पूजा-अर्चना में व्यापक तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। मदार साहब के मेले में सबसे ज्यादा कौड़िया, गूगल, गंगापारी लोभान की बिक्री होती है मेला में 150 रुपए से दो सौ रुपए प्रति किलो की दर से लोभान उपलब्ध है। मच्छरों, मक्खियों सहित कई प्रकार के जहरीले कीटों से बचने के लिए लोभान रामबाण है। इसके जलाने से वातावरण भी शुद्ध होता है।