
जब पहली बार हारा सुल्तान...मुलायम सिंह यादव की हर कोशिश हुई नाकाम, अपनों ने ही दे दी मात
विनोद निगम
कानपुर. कहते हैं समय सबका इतिहास लिखता है। समय ने मुलायम सिंह का भी इतिहास लिख दिया है। जीवन भर राजनीति के अखाड़े में कभी मात न खाने वाले मुलायम ने चुपचाप हर जंग तो जीत ली, लेकिन इस साल वह अपने ही घर में चित हो गए। उत्तर प्रदेश की राजनीति में इनका करीब 37 साल से बोलबाला रहा। लोहिया के आंदोलन से निकले इस पहलवान ने राजनीति के अखाड़े में बड़े-बड़े दिग्गजों को पटखनी देकर अपनी सियासत को कभी कमजोर पड़ने नहीं दिया। लेकिन नत्थूसिंह के चेले के लिए 2017 बहुत खराब गुजरा। साइकिल की कमान बेटे अखिलेश को देने के बाद परिवार में दरार पड़ गई। 2012 से लेकर 2016 तक किसान नेता को कई मौके पर भाई शिवपाल और बेटे अखिलेश यादव को चेतावनी देकर समझाना पड़ा। पिता से विरासत में मिली साइकिल पर अखिलेश यादव ने कब्जा कर चाचा शिवपाल और उनके समर्थकों को संगठन से बाहर कर नई पारी की शुरूआत कर दी। जिसका परिणाम यह रहा कि विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी बुरी तरह से हार गई। चुनाव हारने के बाद मुलायम ने घर की फूट को कम करने की कोशिश की पर वो नकाम रहे।
लोहिया और चरण सिंह से सीखी सियासत
जीवन भर राजनीति के अखाड़े में कभी मात न खाने वाले मुलायम ने चुपचाप हर जंग तो जीत ली, लेकिन इस साल उन्हें हर मोर्चे पर हार का सामना करना पड़ा। परिवार से लेकर राजनीति में नत्थू सिंह के चेला मात खाता रहा। वह अपने पुत्र और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, अपने ही चचेरे भाई रामगोपाल यादव से राजनीतिक लड़ाई हार गए। राजनीति से संन्यास लेने की उम्र में मुलायम के हाथ से उनके अपनों ने ही न केवल राजनीति पार्टी ही नहीं, बल्कि चुनाव चिन्ह समेत सबकुछ छीन लिया। जबकि मुलायम ने इससे पहले राजनीतिक जीवन में कभी हार नहीं मानी। हर जंग लड़े और जीतते चले गए। डीएबी कॉलेज के राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर अनूप सिंह कहते हैं कि मुलायम सिंह यादव यूं तो बचपन से पहलवानी करते रहे हैं पर राजनीति के अखाड़े में कई दांव-पेंच उन्होंने राममनोहर लोहिया और चौधरी चरण सिंह से सीखे। उन्हीं के साथ मुलायम ने कांग्रेस-विरोधी राजनीति की धार को और तीखा किया। चौधरी चरण सिंह ने उनको उत्तर प्रदेश की राजनीति में जड़ें जमाने में काफ़ी मदद की।
1967 में पहली बार चुने गए विधायक, माहिर खिलाड़ी
मुलायम सन 1967 में पहली बार राम मनोहर लोहिया के नेतृत्व वाली संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (संसोपा) के टिकट पर विधायक चुने गए। पर लोहिया की मृत्यु के तुरंत बाद 1968 में वो चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व वाली भारतीय क्रांति दल में शामिल हो गए। बाद में संसोपा और भारतीय क्रांति दल का विलय करके भारतीय लोकदल बनाया गया। मुलायम सिंह ने इस पार्टी पर अपनी पकड़ मज़बूत की और 1977 में जब बीएलडी का जनता पार्टी में विलय हुआ तो मुलायम सिंह मंत्री बन गए। प्रोफेसर अनूप सिंह बताते हैं, 1989 के चुनावों में राजीव गांधी का करिश्मा उतार पर था और ये माना जा रहा था कि वो चुनाव नहीं जीत पाएंगे।ऐसे में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कांग्रेस से बग़ावत कर दी। चुनाव के बाद जनता दल की सरकार बनाने की क़वायद शुरू हुई, लेकिन चुनौती तब पैदा हुई जब चंद्रशेखर ख़ुद प्रधानमंत्री बनने के लिए जोड़-तोड़ करने लगे। उस वक़्त के दूसरे खुर्राट नेता देवीलाल उस समय विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ थे। तब मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के उभरते राजनेता थे और चंद्रशेखर के साथ खड़े थे। मगर ऐन वक़्त पर मुलायम पलटे और देवीलाल के साथ चले गए। चंद्रशेखर टापते रह गए और वीपी सिंह प्रधानमंत्री बन गए।
वक्त देखकर लेते थे निर्णय
वीपी सिंह का चुपचाप सहयोग पाकर मुलायम सिंह यादव यूपी में अपनी ताकत दिखाकर मुख्यमंत्री हो गए। उनके राजनीतिक गुरू चौधरी चरण सिंह के बेटे चौधरी अजीत सिंह टापते रह गए। आज भी चौधरी अजीत सिंह को 1989 में मिले झटके का दर्द सालता है। 1992 में बसपा के साथ मुलायम ने सरकार बनाई। जब बसपा नेता मायावती ने समर्थन वापस लिया तो गेस्ट हाऊस कांड हो गया। जगदंबिका पाल के नेतृत्व में एक दिन की सरकार बनवाने में भी मुलायम ही शिल्पी थे। भाजपा के सहयोग से 2003 में मुलायम ने यूपी में सरकार बनाई।जबकि भाजपा से उनका हमेशा 36 का राजनीकि समीकरण रहा। मुलायम ने सोनिया गांधी का विदेशी मूल के मुद्दे पर विरोध किया और 2008 में यूपीए एक सरकार को अल्पमत के दौरान समर्थन दिया। प्रोफेसर अनूप सिंह बताते हैं कि मुलायम सिंह यादव के कभी कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया बहुत करीबी थे, लेकिन मुलायम ने समय आने पर उनसे चुपचाप दूरी बना ली। इसके बाद मुलायम ने जीवन में कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। नए साथी मिलते गए, कारवां बनता गया।
Published on:
26 Dec 2017 11:08 am
