
शरीर ने काम करना कर दिया था बंद, डॉक्टरों ने मान ली हार.. फिर किया बड़ा काम
विनोद निगम
कानपुर. आपने ये कहावत जरूर सुनी होगी कि 'जहां चाह है, वहां राह है।' ये लाइन इस युवक के उपर बिल्कुल फिट बैठती है, जिसने तमाम शारीरिक परेशानियों के बावजूद वो कर दिखाया, जो शायद ज्यादातर फिजिकली फिट नौजवान भी नहीं कर पाते।चार्टर्ड एकाउंटेंट्स फाइनल एग्जाम का रिजल्ट जारी किया गया। वहीं, कानपुर के देवांग अग्रवाल ने इसे क्वालीफाई कर बेहद कठिन परीक्षा प्रथम प्रयास में पास की है।
कवि हरवंश राय बच्चन ने सच ही कहा था कि "मंजिलें उन्ही को मिलती है जिनके सपनों में जान होती है,पंखो से कुछ नहीं होता हौसलों से उडान होती है" देवांग ने अपनी जिन्दगी में इस गीत को जिया है। कानपुर के डॉक्टर दम्पति अमित कुमार अग्रवाल और मनीषा अग्रवाल का बेटा देवांग जन्म से ही मस्कुलर डिस्ट्रॉफी नामक बीमारी से पीड़ित है। जन्म के एक साल बाद से ही उसकी मांसपेशियों का शिथिल होना शुरू हो गया था। बड़ा होते होते उसके जिस्म के कई अंगों की ताकत जाती रही। अब तो उसकी श्वास नली की हलचल भी इतनी कमजोर पड़ चुकी है कि बोलने में वो हांफने लगता है।
देश में मस्कुलर डिस्ट्रॉफी के मरीजों की संख्या कम नहीं है लेकिन उनमें से अधिकांश जीवन को बोझ मानकर जी रहे हैं। लेकिन देवांग उनसे अलग है। उसने अपना जीवन किसी सरोकार के लिये जीने की ठानी और अपनी शिक्षा पर पूरा जोर दिया। देवांग ने हाईस्कूल सिटी टाॅप किया तो इण्टरमीडियेट में देश में तीसरा स्थान पाया। इसके बाद उसने देश की पांच कठिन परीक्षाओं में गिनी जाने वाली सीए की परीक्षा उत्तीर्ण करने की ठानी। सीए बनने में जहां 96 प्रतिशत छात्र कई बार फेल होते हैं, वहीं देवांग ने इण्टेन्स से लेकर फाईनल तक का सफर एक ही अटैम्प में पूरा किया है। इस सप्ताह घोषित हुए सीए फाईनल के परिणाम में देवांग बहुत अच्छे अंकों के साथ पास हुआ है।
कई देशों के डॉक्टर्स को दिखाया
देवांग की मां डॉ. मनीषा अग्रवाल ने बताया कि देवांग का जन्म भी नॉर्मल बच्चों की तरह हुआ था, लेकिन जैसे-जैसे वो बड़ा होता गया, उसके बॉडी पार्ट्स ने काम करना बंद कर दिया। हमने देवांग को हर बड़े डॉक्टर को दिखाया। यहां तक की उसे अमेरिका, इंग्लैंड और कई यूरोपीय देश भी ले गए। लेकिन, इस लाइलाज बीमारी का कोई हल नहीं निकला।
नॉर्मल बच्चों की तरह हुआ था जन्म
डॉ. मनीषा ने बताया, "हमने देवांग को कभी इस बात का अहसास नहीं होने दिया कि वो किसी बीमारी से ग्रसित है। भले ही वो नॉर्मल बच्चों की तरह बहुत कुछ नहीं कर सकता, लेकिन मेरा बेटा मानसिक रूप से बहुत स्ट्रॉन्ग है। मैं भाग्यशाली हूं कि ईश्वर ने मुझे ऐसा बेटा दिया है। ईश्वर इस तरह के टास्क हर किसी को नहीं देता। अगर ईजी टास्क होगा तो उसे आसानी से पूरा किया जा सकता है, लेकिन इस टफ टास्क को पूरा करना मुझे अच्छा लगता है। उन्होंने बताया "मेरा बेटा शरीर पर बैठी मक्खी भी नहीं हटा सकता है लेकिन दिमाग से वह बहुत स्ट्रांग है। जिसका रिजल्ट आप सबके सामने है।
12वीं में पहुंचते ही हाथों में काम करना कर दिया बंद
देवांग के पिता डॉ. एके अग्रवाल ने बताया कि "मेरा बेटा दुनिया की सबसे घातक बीमारी से लड़ रहा है। इसके बावजूद भी मैं उसे सेल्फ डिपेंडेंट बनाने के प्रयास में जुटा हूं। उन्होंने बताया, "देवांग ने 2011 में हाई स्कूल की परीक्षा पास कर ली। इसके बाद उसकी परेशानियां काफी बढ़ गईं। जब वो 12वीं में पहुंचा तो उसके हाथों ने काम करना बंद कर दिया। इसके बाद मैंने सीबीएसई के चेयरमैन विनीत जोशी से विनती की तब जाकर देवांग को एक राईटर प्रोवाइड कराया गया।12वीं में देवांग ने 97 प्रतिशत नंबर लाकर सिटी टॉप किया था।
Published on:
28 Jan 2019 02:46 pm
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