
नवरात्र पर्व पर कानपुर आएं यजमान, छह देवी मंदिरों के दर्शन कर कमाएं पुण्य
कानपुर. आर्थिक धार्मिक और क्रांतिकारियों की नगरी कानपुर नवरात्र पर्व पर धर्ममय है। चारों तरह मातारानी के जयकरों की गूंज है। सभी देवी मंदिरों में सुबह से लेकर देररात तक पूजा-पाठ का दौर चल रहा है। घरों में लोग कन्याओं को भोज करा रहे हैं तो गांवों में जवारों की धूम है। वहीं शहर के छह ऐतिहासिक मंदिर हैं जिनका अपना अलग महत्व है। नवरात्र पर्व पर इन सभी मंदिरों में हरसाल सैकड़ों की तादाद में भक्त आते हैं और मन्नतें मांगते हैं। अपने दर पर आने वाले भक्तों को मां खाली हाथ नहीं लौटाती उनकी हर मुराद वह पूरी करती हैं। इन छह मंदिरों में स्थापित मां की मूर्ति पर उनके यहां पर विराजने की कहानी कुछ खास है। यहां के प्राचीन मंदिरों में मां बारादेवी, मां बुद्धादेवी, मां वैभव लक्ष्मी, मां तपेश्वरी देवी, मां जंगली देवी और मां कुष्मांडा हैं। इन मंदिरों में सिर्फ कानपुर के भक्तों की ही नहीं, बल्कि दूर-दूर और दूसरे जिलों से भी भक्त दर्शन-पूजन करने के लिए आते हैं।
इस तरह बरादेवी पड़ा नाम
मां बारा देवी यह मंदिर पौराणिक और प्राचीनतम मंदिरों में शुमार है। शहर के जिस इलाके (दक्षिणी इलाके) यह मंदिर बना है, उस इलाके का नाम भी बारा देवी है। एएसआई के सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार, इस मंदिर में स्थापित मां दुर्गा के स्वरुप की मूर्ति करीब 17 सौ साल पुराना है। मंदिर के पुजारी दीपक कुमार बताते हैं कि एक बार पिता से हुई अनबन पर उनके कोप से बचने के लिए घर से एक साथ 12 बहनें भाग गईं और किदवई नगर में मूर्ति बनकर स्थापित हो गई। पत्थर बनी यही 12 बहनें कई सालों बाद बारा देवी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हो गईं। नवरात्रि के मौके पर इस प्राचीन मंदिर में एक विशाल मेले का आयोजन किया जाता हैस नौ दिनों तक चलने वाले इस मेले में कानपुर के साथ-साथ आसपास के जिले के लोग भी आते हैं। इस दौरान यहां पर जिनकी मन्नतें पूरी होती है, वो ज्वारा लेकर माता के दरबार आते हैं।
ताला वाली मां के नाम से प्रसिद्ध
मां काली देवी शहर के बीच में स्थित बंगाली मोहाल मोहल्ले में एक ऐसा मंदिर है, जहां भक्त अपनी मनोकामना के लिए मां के दरबार में ताला चढ़ाते हैं। मनोकामना पूरी होने पर वहां से ताला खोलकर ले जाते हैं। ं बंगाली मोहाल, तीन सौ साल पुराना मां काली देवी की मंदिर स्थित है। इस मंदिर में आने वाला हर भक्त अपने मनोकामना को पूरी करने के लिए इस मंदिर में एक ताला लगाता है। ताला खोलते समय भक्तों को थोड़ी परेशानी होती है, क्योंकि मनोकामना पूर्ण होने वाला भक्त कब तक आता है ये कोई नहीं जानता। तब तक वो ताला लगाया रहता है, वहां सैकड़ों ताले लग जाते हैं। ऐसे में कभी- कभी कई भक्त अपना ताला नहीं खोल पाते। ऐसे में वो अपने ताले का चाभी मां के चरणो में चढ़ाकर और पूजा कर लौट जाते हैं। मंदिर में हर अमावस्या को माता का दरबार पूरी रात खुलता है और पूरी रात पूजा होती है।
मां सीता ने लव-कुश का कराया था मुंडन
बिरहना रोड स्थित मां तपेश्वरी देवी मंदिर का नजारा अलग ही दिखता है। मंदिर के पुरोहित राधेश्याम के अनुसार, इस मंदिर को लेकर ये कहा जाता है कि माता सीता लवकुश के जन्म के बाद इसी मंदिर में उनका मुंडन संस्कार भी करवाया था। इसके बाद सीता ने लव-कुश को महर्षि वाल्मीकि को सौंपकर इस मंदिर में तप करने के लिए रुक गई थीं। हालांकि, किसी को नहीं पता कि माता सीता ने यहां कितने दिन तक तप किया था। उनके साथ तीन और बहने थीं। सीता को तप करता देख उन तीनों बहनों ने भी सीता के साथ तप करना शुरू कर दिया था। आज भी यहां चार देवियों की मूर्ति स्थापित है। हालांकि, ये कोई नहीं जानता कि कौन सी मूर्ति किसकी है। तप करने की ही वजह से इस मंदिर का नाम तपेश्वरी देवी मंदिर पड़ा है।
प्रसाद के तौर पर बांटा जाता है खजाना
मां वैभव लक्ष्मी मंदिर प्राचीन मां वैभव लक्ष्मी मंदिर बिरहाना रोड में स्थित है। इस मंदिर का अलग ही महत्व है। नवरात्रि के दौरान आने वाले शुक्रवार को इस मंदिर में श्रद्धालुओं को खजाना दिया जाता है। मां के प्रसाद रूपी खजाने को लेने के लिए मंदिर के बाहर करीब एक किमी तक भक्तों की लंबी कतार लगी रहती है। मंदिर के प्रबंधक अनूप कपूर के अनुसार, 100 साल पहले साल 1889 में इस मंदिर का निर्माण कराया गया था। तब इस मंदिर में भगवान शंकर और राधा कृष्ण की मूर्ति को स्थापित किया गया था। साल 2000 में इस मंदिर के अंदर मां लक्ष्मी की मूर्ति को स्थापित किया गया। इस मंदिर में शुक्रवार को एक दिन में करीब ढाई लाख रुपए के आसपास श्रद्धालु इस खजाने को लेकर जाते हैं। इस खजाने की तैयारी भी नवरात्रि आने के करीब दो महीने पहले से शुरू कर दी जाती है।
इस मंदिर में भक्त चढ़ाते हैं सब्जियां
मां बुद्धा देवी मंदिर कानपुर के सबसे प्राचीन हटिया बाजार इलाका अपने आप में पूरा इतिहास समेटे हुए हैं। इसी इलाके में मौजूद हैं मां बुद्धा देवी। इन्हें प्रसाद के रूप में लड्डू, बताशे या फल नहीं, बल्कि सीजनल ताजी सब्जियां चढ़ाई जाती है। नवरात्रि के समय मां की दर्शन करने के लिए कानपुर के आसपास के जिलों से भक्तों की भीड़ लगती है। यहां सब्जियों में लौकी के टुकड़े, बैगन, पालक, टमाटर, गाजर, मूली और आलू तक मौजूद रहता है। इस मंदिर के पुजारी भी कोई पुरोहित या पंडित नहीं है, बल्कि यहां के पुजारी को राजू माली के नाम से पुकारा जाता है।
प्रसाद स्वरुप मां के चरणों का जल
शहर से 40 किमी दूर कानपुर सागर हाईवे स्थित घाटमपुर में मां कुष्मांडा देवी का मंदिर है। इस मंदिर का इतिहास सैकड़ों साल पुराना है। मंदिर के पुजारी ने बताया कि आज से करीब 2000 साल पहले खुदाई के दौरान मां की मूर्ति निकली थी द्य जिसे एक पेड़ के नीचे रखवा दिया गया था। घाटमपुर के जमीदार ने 1858 में मां के मंदिर का निर्माण करवाया था। पुजारी के मुताबुक नवरात्र पर हर साल हजारों की संख्या में भक्त आते हैं।कुष्मांडा देवी के पैरों से जल निकलता है और प्रसाद के रुप में वही दिया जाता है। मां के चरणों में जल कहां से आता है यह किसी को नहीं पता। कई साइंटिस्ट आए, लेकिन इस रहस्य को खोज नहीं पाए।
Updated on:
22 Mar 2018 02:53 pm
Published on:
22 Mar 2018 07:11 am
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