
बुर्जर रोग के मरीजों में बिना नसें काटे ही खत्म हो जाएगा गैंगरीन का खतरा
कानपुर। बुर्जर रोग यानि बर्जर्स डीजीज के मरीजों की न तो अब सिकुड़ी नसें काटनी पड़ेगी और न उनमें गैंगरीन का खतरा रहेगा। ऐसे मरीजों की नसों में सुई के माध्यम से दवा पहुंचाकर उनको खोल दिया जाएगा। नसों को खोलने के लिए केमिकल सिम्पैथेटिक्टमी तकनीक का इस्तेमाल कानपुर में मेडिकल कॉलेज में शुरू हो गया है। एनेस्थीसिया विभाग में मरीजों का नि:शुल्क इलाज हो रहा है। यह तकनीक पूरी तरह सफल है। इस तकनीक से बर्जर्स डिजीज का इलाज दिल्ली और लखनऊ में होता है। निजी क्षेत्र में इस तकनीक से इलाज का खर्च 50 हजार तक आता है। सर्जरी कराने पर और अधिक पैसे खर्च होते हैं।
क्या है बुर्जर रोग और कारण
यह रोग तेजी से छोटे और मध्यम आकार की धमनियों और नसों को प्रभावित करता है। ट्यूनिका इंटीमा में सूजन शुरू हो जाती है और इसके चलते इस्कैमिया और अंगों और अंकों के अल्सरेशन के साथ थ्रोम्बिसिस और खून का दौड़ान रुकता है। यह रोग तम्बाकू के ज्यादा सेवन से होता है। आठ-दस साल से तंबाकू का सेवन कर रहे लोगों पर बर्जर्स डिजीज का खतरा मंडराने लगता है। निकोटीन के कारण नसें सिकुडऩे लगती हैं। गैंगलियान कोशिकाओं का जमाव होने लगता है। पैरों, हाथों की नसों में दर्द होने लगता है। गैंगरीन भी हो सकता है। जिससे अंग कटने की नौबत आ जाती है।
बुर्जर रोग के लक्षण
इस बीमारी से पीडि़त लोगों में चलने पर पैरों, एडिय़ों, या पैरों में दर्द रहता है। हाथ पीला, लाल, या नीला पड़ जाता है और हाथों और पैरों में दर्द रहता है। इसके अलावा हाथों या पैरों पर त्वचा में परिवर्तन, दर्दनाक घाव, या अल्सर बन जाता है। मरीज के हाथ और पैर ठंडे रहते हैं। तंबाकू का लगातार सेवन करते रहने पर बर्जर्स डिजीज के लक्षण आने लगते हैं। हैलट की ओपीडी में पैरों की पिंडलियों और बाहों में दर्द के लक्षण वाले 60 से 70 मरीज रोज आते हैं। हैलट और निजी अस्पतालों में 15 मरीजों की सर्जरी प्रतिदिन होती है।
क्या है गैंगरीन
जब आपके शरीर के किसी भी हिस्से में चोट लग जाती है, और वे सही ढग़ से ठीक नहीं होते हैं तो कुछ दिनों के बाद यह सडऩे लगता है और यह एक नई समस्या पैदा करती है जिसे गैंगरीन के नाम से जाना जाता है। गैंगरीन का अर्थ है ऊतक का सडऩा। यह रोग इतना घातक है कि यह आपके शरीर की हर कोशिका को प्रभावित कर सकता है और एक दिन आपकी मृत्यु शरीर के सडऩे के कारण हो सकती है।
तीन तरह का होता गैंगरीन
पहली होती है सूखी गैंगरीन। यह शरीर के बाहरी हिस्से में विकसित होती है। यह अंग तक पर्याप्त मात्रा में खून ना पहुंच पाने के कारण होता है। दूसरी होती है शुष्क गैंगरीन। यह आमतौर पर बुजुर्गों के पैरों और उनकी उंगलियों पर विकसित होता है। और तीसरा प्रकार है वेट गैंगरीन का। यह नम ऊतकों में होता है, जैसे कि मुंह, फेफड़े, आंत, सर्विक्स (गर्भाशय ग्रीवा) और वाल्व आदि। कूल्हे व एडिय़ों आदि पर होने वाले बेड सोर्स भी वेट गैंग्रीन का एक प्रकार होता है। गैस गैंगरीन एक प्रकार का जीवाणु संक्रमण है, जो ऊतकों में गैस पैदा करता है। यह गैंगरीन का सबसे गंभीर प्रकार है। संक्रमण बहुत तेजी से फैलता है।
गैंगरीन के लक्षण
शरीर के प्रभावित हिस्से का रंग खराब हो जाता है और अंत में गहरा काला और पूरी तरह से सूख जाता है। वजन वाले गैंगरीन से प्रभावित ऊतकों में सूजन आ जाती है और त्वचा से बदबू आने लगती है। ड्राई गैंगरीन के कारण त्वचा पूरी तरह से सूख जाती है और रंग गहरा लाल या काला हो जाता है। गैस गैंगरीन बहुत खराब गंध पैदा करता है और भूरे रंग का मवाद विकसित होने लगता है।
हार्ट और ब्रेन अटैक का खतरा
नसें सिकुड़ी होने की वजह से खून का थक्का जम सकता है, जिससे हार्ट या ब्रेन अटैक पड़ सकता है। केमिकल सिम्पैथेटिक्टमी तकनीक में सुई से दवा रोगी की नसों में डाल दी जाती है, जिससे गैंगरीन पैदा करने वाली कोशिकाएं गैंगलियान निष्क्रिय हो जाती हैं और नसों में रक्त का प्रवाह सामान्य हो जाता है। एनेस्थीसिया विभाग के अध्यक्ष डॉ. अपूर्व अग्रवाल ने बताया कि अभी तक 14 रोगियों पर यह प्रयोग सफल रहा है। अल्ट्रसाउंड और एक्सरे कराया जाता है। इसके बाद ओटी में सुई से प्रभावित स्थान में दवा डाल दी जाती है। तकनीक का इस्तेमाल करने वाली टीम में डॉ. शुभ्रा और डॉ. हिना शामिल हैं।
Published on:
15 Jan 2020 01:17 pm
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