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जनता की आने लगी याद, लगता है फिर चुनाव होने को हैं !

इस काम में सत्ता में काबिज पार्टी के साथ वो पार्टियां भी जनता से सरोकार रखने वाले मुद्दों पर अपनी राय रखने के लिए दुकाने सजाने लगीं है जो सत्ता के सुख को भोगने के जुगाड़ में लगी है।

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vikas vajpayee

Sep 06, 2016

political parties start political gimmicks

political parties start political gimmicks

विकास वाजपेयी
कानपुर - नेताओं के मुहं से एक बार फिर जनता के दुख दर्द की बात सुनकर लोगो को ऐसा लगने लगा है कि उत्तर प्रदेश में 2017 विधानसभा चुनाव की तैयारिया जोरो से शुरू होने लगी है। पांच साल तक जनता के वोटो पर ऐस करने वाले नेताओं को अब फिर से उनकी दिक्कत और परेशानियों की चिन्ता सताने लगी है और इस काम में सत्ता में काबिज पार्टी के साथ वो पार्टियां भी जनता से सरोकार रखने वाले मुद्दों पर अपनी राय रखने के लिए दुकाने सजाने लगीं है जो सत्ता के सुख को भोगने के जुगाड़ में लगी है।

अखिलेश यादव के विकास को घर घर तक पहुंचाएं
एक समय था कि समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिहं यादव को मलाल था कि कानपुर की जनता सरकार बनाने में समाजवादी पार्टी का साथ नहीं देती। हलांकि जनता ने पिछले 2012 के विधान सभा चुनावों में मुलायम सिहं यादव के इस दुख को समझा और कानपुर से समाजवादी पार्टी को ऐतिहासिक विजय दिलाई।
कानपुर में लोगो द्वारा समाजवादी पार्टी और मुलायम सिहं यादव को समर्थन देने के पीछे केवल एक ही उद्देश्य था कि कानपुर का विकास हो। लेकिन पिछले पांच सालों में कानपुर की जो हालत थी वो जस की तस रही।
हलांकि 2017 के चुनाव की दस्तक ने फिर से नेताओं को वोटरो के दरवाजे पर खड़ा कर दिया है। कानपुर में आये समाजवादी पार्टी के प्रशिक्षण शिविर परिवेक्षक सतीश दीक्षित ने जो विकास काम समाजवादी सरकार में शुरू भी नहीं किये गये उनको भी जनता तक पहुंचाने की बात कही। तो प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधते हुए कहां कि मोदी हवां में तीर चला रहे है।

मेट्रो का नामो निशान नहीं पर बैनर में पूरे किये वादे
2012 के विधान सभा चुनाव के समय कानपुर का चक्कर लगाने वाले समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिहं यादव और अखिलेश यादव ने कानपुर में मेट्रो परियोजना को सबसे पहले लागू करने का वादा किया था।
शहर की विकराल ट्रैफिक व्यवस्था पर वादो का मरहम लगाते हुए अखिलेश यादव ने मेट्रो परियोजना को कानपुर की सबसे बड़ी जरूरत भी बताया था। लेकिन हकीकत में पांच साल बीतने के बाद भी शहर में मेट्रो परियोजना के नाम पर एक भी ईट नहीं रखी जा सकी।
विकास की जगह पर शहर भर में लाखों रुपये खर्च करके केवल बैनर और पोस्टरों के माध्यम से जनता की विकास की भूख को शान्त करने का प्रयास किया गया। यहीं नहीं लोगो की उम्मीदों को मुहं चिढ़ाते पोस्टरो पर तो मेट्रो परियोजना को पूरे हुए वादो के तौर ही दर्शाया गया है।
यहां सड़क नहीं गड्डो में चलती है गाड़ियां
कानपुर की दस में से पांच सीटो पर 2012 के चुनावों में जीत की इबारत लिखने वाली समाजवादी पार्टी की सरकार ने प्रदेश की आर्थिक राजधानी के लिए कभी कोई पुख्ता कार्य योजना ही तैयार नहीं की। हलांकि ये ऐसा पहला मौका था कि समाजवादी पार्टी को कानपुर से इतना बहुमत हासिल हुआ था।
देश में सरकार को राजस्व देने के मामले में कानपुर का भले ही शीर्ष दस में स्थान हो लेकिन यहाँ पर दूसरी व्यवस्थाओं को छोड़ दे तो सड़क पर चलना भी कोई आसान काम नहीं है। लोग सड़कों पर कम बल्की गड्ड़ों में चलने को ज्यादा मजबूर होते है।
ऐसे में जनता को फिर से बरगलाने के प्रयास तेज हो गये है और वो सब भूलने के लिए मनाया जा रहा है जिन वादों के रथ पर सवार होकर पार्टिया सत्ता के सुख का आन्नद लेती है और पांच साल बाद फिर से वादे पूरे करने का लालच दिया जाता है।
हलांकि इस काम में पार्टियों के झण्ड़ो के केवल रंग बदलते है लेकिन हकीकत में चाल और चरित्र में उनमें अन्तर निकाल पाना शायद वोटरों के लिए मुश्किल काम है।