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1700 सौ वर्ष पुराने बारादेवी मंदिर में कोरोना वायरस के चलते भक्तों के प्रवेश पर रोक

मंदिर प्रशासन ने 21 दिनों के लिए कपाट किए बंद, नवरात्रि पर्व पर पहली बार दर्शन नहीं कर पाएंगे भक्त, पुजारी सुबह के वक्त की पूजा-अर्चना।

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1700 सौ वर्ष पुराने बारादेवी मंदिर में कोरोना वायरस के चलते भक्तों के प्रवेश पर रोक

1700 सौ वर्ष पुराने बारादेवी मंदिर में कोरोना वायरस के चलते भक्तों के प्रवेश पर रोक

कानपुर।कोरोना वायरस के चलते पहली बार नवरात्रि पर्व में कानपुर के सबसे पुराने और ऐतिहासिक बारादेवी मंदिर में भक्त पूजा-अर्चना नहीं कर पाएंगे। लाॅकडाउन के चलते मंदिर 21 दिन तक के लिए बंद कर दिया गया है। पुजारी के मुताबिक सुबह के वक्त महाआरती की गई और माता रानी के चरणों में प्रसाद चढ़ाया गया। कहते हैं, साल के बारह महीनों और खासतौर पर नवरात्रि में लाखों भक्तों की अटूट आस्था बारा देवी मंदिर में भीड़ के रूप में उमड़ती है।

मंदिर का इतिहास
मंदिर के पुजारी दीपक ने मंदिर के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए बताया कि पिता से हुई अनबन पर उनके कोप से बचने के लिए घर से एक साथ 12 बहनें भाग गई। सारी बहनें किदवई नगर में मूर्ति बनकर स्थापित हो गई। पत्थर बनी यही 12 बहनें कई सालों बाद बारादेवी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हुई। कहा जाता है कि बहनों के श्राप से उनके पिता भी पत्थर हो गए थे। कहते हैं, यहां पर आने वाले हर भक्त की मनोकामना मंा बारादेवी पूरी करती हैं। कोरोना वायरस के खात्में के लिए मां के चरणों में माथा टेका गया और भक्तों से घर पर ही पूजा-अर्चना को कहा गया है।

12 देवी के नाम से मोहल्ले
म्ंदिर मंदिर के पुजारी बताते हैं बारा देवी मंदिर का इलाका, बारा देवी के असली नाम से जाना जाता है। कानपुर दक्षिण के ज्यादातर इलाकों के नाम बारा देवी मंदिर के नाम पर ही रखे गए हैं। इन इलाकों में बर्रा 01 से लेकर बर्रा 09 तक, बिन्गवा, बारासिरोही आदि। बर्रा विश्व बैंक का नाम भी देवी के नाम पर ही रखा गया है। बताते हैं, बारा देवी मंदिर में आने वाला हर भक्त अपनी मनोकामना मांग कर चुनरी बांधता है, तो कहीं पर श्रद्धालु मां को रिझाने के लिए खतरनाक करतब भी कर दिखाते हैं। कोई आग से खेलता है तो कोई अपने गाल के आरपार नुकीली धातु पार कर दिखाता है।

एएसआई ने लगाई मुहर
पुजारी के मुताबिक कुछ समय पहले एएसआई की टीम ने इस मंदिर का सर्वेक्षण किया था जिसमें पता चला था कि मंदिर की मूर्ति लगभग 15 से 17 सौ वर्ष पुरानी है। पुजारी कहते हैं कि जिन दंपत्ति की गोद सूनी होती है वह यहां नवरात्रि पर आते हैं और मां को चुनरी अर्पित कर पुत्र व कन्या प्राप्त के लिए मन्नत मांगते हैं। मातारानी की कृपा से उनके घर पर किलकारियों की गूंज सुनाई देती है। वह यहीं पर आकर अपने बेटे व बेटी का पहला मुंडन भी करते हैं। लेकिन अब अगले नवरात्रि में भक्त आ पाएंगे।