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115 साल बाद हुआ दूसरा जन्म, पढ़िए बाबा के ‘पुनर्जन्म’ की कहानी

अभी तक अापने पुनर्जन्म को सिर्फ किस्सों-कहानियों में सुना होगा, लेकिन बाबा नारायण दास ने बयां की अपने पुनर्जन्म की सच्ची दास्तान। जिसे सुनकर आप भी रह जाएंगे हैरान।

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UP Patrika

Jul 21, 2016

kanpur baba narayan das

kanpur baba narayan das

कानपुर.
पहले तो आराम से रथ मे बैठाकर किसी सुंदर जगह पर ले गए। उसके बाद एक दरबार में पेश किया गया। जहां मुझे कोड़े लगाने की सजा सुनाई गयी। फिर क्या एक मोटे से काले जल्लाद ने कोडे और डंडो से मुझे जमकर पीटा। अगर कोई इंसान इस प्रकार की घटना को बयां करे, तो लोग हैरान रह रह जाएंगे और कहेंगे ये सब बकवास है। लेकिन ऐसा ही एक वाक्या झींझक में सामने आया है।




राजा ने सुनाई थी कोड़े मारने की सजा- बाबा

झींझक के बालाजी मंदिर के 115 साल के पुजारी बाबा नारायण दास, जो कि हनुमान मंदिर के पुजारी हैं। कई सालों से वो हनुमान जी की सेवा मे लगे हुए हैं और अब वृद्धावस्था के चलते वो चलने-फिरने में असमर्थ हो गए हैं। कहा जाता है कि पुजारी जी पर हनुमान जी की छाया हमेशा रहती है। दूर दराज के लोग झाड़फूंक के लिये इस दरबार में आते हैं।




पुजारी जी का कहना है कि कई बार उनके साथ ऐसा हादसा हुआ है। उसी प्रकार विगत गुरु पूर्णिमा को जब वो दिन मे सो रहे थे। उसी दौरान उन्हें एक सपना आया कि उनको कोई बुला रहा है। जब वो उठकर चले तो एक रथ में उन्हे बैठाकर ले जाया गया। एक सुंदर दरबार में पेश किया गया। जहां सामने एक गद्दी पर मुकुट लगाए राजा ने अपने पास बैठे दूसरे मंत्री से कुछ कहा। जिसके बाद पुजारी को कोडे की सजा सुनाई गई। फिर उन्हें वापस रथ से किसी अंधेरी जगह पर छोड़ दिया गया। बाबा नारायण दास के कई घंटो तक लगातार सोने से इधर सारा घर परेशान हो गया था। तभी सुबह 5 बजे अचानक उनकी जब आंख खुली तो वो रोने लगे। परिजनों ने जब उनसे पूछा तो उन्होंने सारी कहानी सुना डाली। इसकी खबर लगते ही उनके भक्तों और ग्रामीणों ने खुशियां मनाते हुए उनका जन्मदिन मनाया।




100 साल के होने पर बाबा ने छोड दिया था अन्न

ईश्वर की आराधना में मशगूल रहने वाले बाबा नारायन दास का कहना है कि इंसान की उम्र 100 साल होती है। 15 साल पहले जब उनकी अवस्था 100 साल की हो गयी थी। तो उन्होंने अन्न खाना छोड दिया था। तब से वो दूध और फल खाकर जीवन व्यतीत करते हैं। उनके पुत्र बाबा नरेंद्र दास ने बताया कि फरवरी महीने में एक बार उन्होंने 4 दिन तक दूध और फल नहीं खाये। वजह पूछने पर उन्होंने बताया कि देवी मां इस समय उन्हें दूध पिला रही हैं। इसलिए भूख नहीं लगती है। ये सुनकर सभी अचम्भे मे पड़ गए। उन्होंने बताया कि कभी कभी वो अकेले में बैठकर किसी से बातें किया करते हैं। लेकिन पूछने पर चुप्पी साध जाते हैं।


कैसे हुई इस मंदिर की स्थापना

बताते हैं कि बाबा नारायण दास जब 33 साल के थे। तो वो खेती बाड़ी का काम किया करते थे। एक दिन अचानक सोते समय उन्हें एक सपना आया। जिसमें उनसे सफेद वस्त्र धारक चमकते ललाट वाले किसी देव ने कहा कि तुम्हें इस धरती पर खेती बाड़ी के लिये नहीं बल्कि लोगों की सेवा करने के लिये भेजा गया है। उन्होंने कहा कि इस स्थान पर एक प्रतिमा गड़ी हुई है। उसे खुदवाकर उसकी स्थापना कराओ। सुबह होते ही आश्चर्य में पड़े बाबा ने उस स्थान को खुदवाया। जहां एक हनुमान प्रतिमा निकली। जिसकी विधि विधान से स्थापना कराकर बाबा नारायण दास उनकी सेवा करने लगे। धीरे धीरे उनकी ख्याति बढ़ने लगी। फिर दूर दराज से आने वाले परेशान लोगों की वो सेवा करने लगे। आज भी वो मंदिर की भभूति देकर लोगो के संकट दूर करते हैं।


नरेंद्र दास का कहना है कि उनके पिता बाबा नारायण दास ने अपनी पूरी उम्र इस मंदिर की सेवा में लगा दी। गुरु पूर्णिमा को उनकी जुबानी सुनने के बाद गांव के भक्तों ने उनके नये जन्म के रूप में जन्मदिन मनाने की ठान ली। जिसके बाद उनका 116वां जन्मदिन मनाया गया है।

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