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शहर में राजस्व चोरी के दम पर चल रहे थे ३७५ फर्जी उद्योग

फर्जी बिल काटकर २५० करोड़ के राजस्व का लगाया गया चूनाशक होने पर जांच हुई तो जमीन पर कहीं मिली ही नहीं ये फर्में

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शहर में राजस्व चोरी के दम पर चल रही थे ३७५ फर्जी उद्योग

शहर में राजस्व चोरी के दम पर चल रही थे ३७५ फर्जी उद्योग

कानपुर। राजस्व विभाग की तमाम कोशिशों के बावजूद फर्जीवाड़ा करने वाले अफसरों की नाक के नीचे ही खेल कर रहे हैं। जब तक इस खेल का खुलासा होता है तब तक करोड़ों के वारे-न्यारे हो जाते हैं। कानपुर जैसे शहर में जहां पर राजस्व विभाग के अफसर बड़ी टीम के साथ चौकस रहते हैं, फिर भी उसे फर्जी उद्योगों ने २५० करोड़ का चूना लगा दिया। यह खेल करने वाले उद्योगों की संख्या एक-दो नहीं बल्कि ३७५ निकली। यह खेल सामने आने के बाद अफसर खुद हैरान हैं, इतनी बड़ी संख्या में फर्जी फर्में कैसे राजस्व चोरी का खेल करती रहीं और किसी को भनक नहीं लगी।

धड़ाधड़ काटे जाते रहे फर्जी बिल
फर्जी फर्मों की आड़ में चल रहे अरबों के इस खेल की जड़ें कानपुर में काफी गहरी हैं। राजस्व आसूचना निदेशालय, राजस्व खुफिया निदेशालय ने जब ऐसी 375 फर्मों को पकड़ा तो पता चला कि ये सिर्फ बिल काटकर फर्जी आईटीसी में लिप्त थीं। जमीन पर ये कहीं थी ही नहीं। ये फर्में 250 करोड़ रुपए की टैक्स चोरी कर चुकी हैं। जांच में यह आंकड़ा और बढऩे के आसार हैं।

इन इलाकों में बताई गईं थी फर्में
कर चोरी के इस बड़े रैकेट में शामिल ज्यादातर फर्में नौबस्ता, मछरिया, सनिगवां, अहिरवां, मसवानपुर और देहली सुजानपुर के पते पर बनाई गईं। कुछ नयागंज, कलक्टरगंज, सुतरखाना, एक्सप्रेस रोड के पते पर पंजीकृत कराई गई थीं। करीब 40 से ज्यादा ट्रांसपोर्ट नगर और बाबूपुरवा में बनाई गईं।

इस कारण खुल गया खेल
पिछले नौ महीने की मैचिंग में पाया गया कि एक ही माल और लगभग एक ही तरह की तौल की सप्लाई इन फर्मों के जरिए की जा रही थी। इसमें सबसे ज्यादा सुपाड़ी, लोहा, रेडीमेड और इलेक्ट्रॉनिक्स के बिल काटे जा रहे थे। कुछ फर्में सुगंध और सीमेंट के बिल काटने का धंधा भी कर रही थीं। शक होने पर भौतिक सत्यापन किया गया तो भंडाफोड़ हो गया।

जमीन पर कहीं नहीं थे ये उद्योग
जांच के दौरान पाया गया कि इन उद्योगों के जो पते दिए गए थे वहां कुछ था ही नहीं। या फिर दिए गए एक पते पर ऐसी दर्जनों फर्में पंजीकृत मिलीं, जिनमें कोई काम नहीं हो रहा था। जांच में पाया गया कि तीन से पांच फीसदी कमीशन पर बिल काटे जा रहे थे। इन बिलों के आधार पर कारोबारी इनपुट टैक्स क्रेडिट का फर्जी भुगतान ले रहे थे।