
कानपुर की क्रांति का गवाह है सत्तीचौरा घाट, अंग्रेजों को गोलियों से किया गया था छलनी, ऐतिहासिक थी घटना
पत्रिका न्यूज नेटवर्क
कानपुर. 1857 की आजादी की जंग का इतिहास समेटे कानपुर का नानाराव घाट, जिसे आजादी की जंग के दौरान सत्तीचौरा घाट कहा जाता था। क्रांति के दौरान 300 अंग्रेजो को गोलियों से छलनी कर दिया गया था, लाशों के खून से घाट लाल हो गया था। आज भी वह घाट अंग्रेजों की मौत का गवाह बना हुआ है। इस रक्तरंजित घटना के बाद अंग्रेजों ने इसे मैस्कर घाट घोषित किया। बाद में यह घाट नानाराव घाट के नाम से जाना जाने लगा। 1857 का दौर था और कानपुर में 4 जून को क्रांति विद्रोह का बिगुल बज गया। उस दौरान विद्रोही सैनिकों ने अंग्रेजों के कोषागार लूट लिया और कई बंगलों में आग लगा दी। इसके बाद दिल्ली चलो का नारा लगाया।
इधर नाना साहब व अजीमुल्ला खां विद्रोही सैनिकों को ले आए और कानपुर को अंग्रेजों से मुक्त कराने की बात कही। फिर छावनी को 26 जून तक घेर रखा। जिसके बाद तत्कालीन जनरल एच व्हीलर और कलक्टर हिलडर्सन ने समझौते का प्रस्ताव रखा। इसमें निर्णय लिया गया कि रातों रात अंग्रेज किला खाली कर देंगे तो उन्हें इलाहाबाद जाने दिया जाएगा। इस पर नाना साहब के आदेश पर समाधान निषाद ने 27 जून की सुबह सत्तीचौरा घाट पर 40 नावें लगाईं। इस दौरान विद्रोही सैनिकों के साथ हजारों लोग सत्तीचौरा घाट पर पहुंचे थे। अंग्रेज अपने परिवारों सहित नावों पर सवार हुए।
जैसे ही नावें आगे बढ़ीं तभी शंखनाद हो गया। इसे विद्रोह का बिगुल समझकर कुछ नाविकों ने गंगा में छलांग लगा दी। भयभीत अंग्रेजो ने नाविकों पर गोली चलाना शुरू कर दिया। तो पलटवार में विद्रोही सैनिको ने भी जवाब में गोलियां चलाईं। इतिहासकार अनूप शुक्ला बताते हैं कि यह पहली ऐसी घटना है जो सुनियोजित नहीं थी, जिसे नाना साहब ने दूत भेजकर रोकने के निर्देश दिए। उनके निर्देश के बाद 73 अंग्रेज महिलाओं व बच्चों को बचाया गया और उन्हें सवादा कोठी में लाकर रखा गया। आज भी नानाराव घाट गवाही देता है।
Published on:
05 Aug 2021 02:32 pm
बड़ी खबरें
View Allकानपुर
उत्तर प्रदेश
ट्रेंडिंग
