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जरा याद करो कुर्बानी : भुजाओं को फडक़ाने वाला गीत लिखने वाले श्यामलाल हुए गुमनाम

कानपुर के ‘पार्षद’ को देश-प्रदेश की नई पीढ़ी जानती भी नहीं है। झंडा ऊंचा रहे हमारा लिखकर जंग-ए-आजादी को आगे बढ़ाया था। 

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Shyamlal gupta parshad

Shyamlal gupta parshad

कानपुर. विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊँचा रहे हमारा... 3/4 मार्च 1924 की रात्रि को रचा-गढ़ा यह अमरगीत आज भी गूंजता रहता है। गीत को लिखने वाले कानपुर के नर्वल गांव के श्यामलाल गुप्ता ‘पार्षद’ को लोग भूल गए। ईमानदारी की मिसाल श्यामलाल गुप्ता की कलम के दीवाने लोगों में पत्रकारिता के पुरोध गणेशशंकर विद्यार्थी से लेकर जवाहरलाल नेहरु तक शामिल थे, लेकिन ताजिंदगी उसूलों पर टिके रहने वाले श्यामलाल फाकाकशी में मस्त रहे। आजादी के मतवाले श्यामलाल किसी किस्म की बंदिश के खिलाफ थे, इसी नाते उन्होंने तीन साल का अनुबंध भरने की नौबत आने पर दो मर्तबा सरकारी नौकरी को ठुकरा दिया था। आजादी के बाद श्यामलाल गुप्ता को पदम पुरस्कार लेने के लिए दिल्ली न्योता गया तो उन्हें अपने परिचित से धोती और चप्पल मांगकर पहननी पड़ी थी। वाकई बड़े अलबेले थे आजादी के दीवानी क्रांतिकारी श्यामलाल गुप्ता।

दस साल की उम्र में पहली कविता और 28 साल में अमरगीत

9 सितंबर 1896 को कानपुर के नर्वल गांव में विश्वेश्वर प्रसाद और कौशल्या देवी के पुत्र के रूप में पैदा हुए श्यामलाल गुप्ता ने पांचवी कक्षा में पढऩे के दौरान पहली कविता लिखी थी। 15 साल की उम्र में श्यामलाल की लेखनी प्रखर होने लगी थी, लेकिन पिता अपने बेटे को बड़ा आदमी बनाना चाहते थे। ऐसे में उन्होंने श्यामलाल की रचनाओं को कुएं में फेंक दिया था। बावजूद श्यामलाल साहित्य साधना में जुटे रहे। बात है 3/4 मार्च 1924 की। एक साल पहले 1923 में फतेहपुर जिला कांग्रेस के अधिवेशन में आधुनिक तिरंगे का स्वरूप तय हो चुका था, लेकिन भुजाओं को फडक़ाने वाले एक प्रेरक गीत की जरूरत थी। बात श्यामलाल गुप्ता तक पहुंची तो उन्होंने कानपुर के फूलबाग अधिवेशन से डेढ़ महीने पहले एक रात जागकर झंडागीत को रच दिया। पांच छंदों में लिखे इस गीत के पहले और आखिरी छंद को बेहद लोकप्रियता मिली। जालियावालां बाग नगसंहार स्मृति में पहली बार इस गीत को सामूहिक रूप से 13 अप्रैल 1924 को कानपुर के फूलबाग मैदान में गुनगुनाया गया था। इस सभा में जवाहर लाल नेहरू भी मौजूद थे।

गुलामी के सख्त खिलाफ थे, इसलिए छोड़ी सरकारी नौकरियां

श्यामलाल गुप्ता को पार्षदी जी के उपनाम से भी जाना-पहचाना जाता था। क्रांतिकारी पार्षदजी ने पहली नौकरी जिला परिषद के अध्यापक के रूप में शुरू की, लेकिन जब तीन साल का अनुबंध लिखने का नंबर आया तो गुलामी से इंकार करते हुए उन्होंने नौकरी को त्याग दिया। इसके बाद नगर निगम के स्कूल में अध्यापक पद पर नियुक्त हुए, लेकिन कुछ समय बाद यहां भी अनुबंध की बात आई तो दुबारा नौकरी को ठुकरा दिया। इसके बाद श्यामलाल गुप्त ने आजादी के लिए खुद को समर्पित कर दिया। पत्रकारिता के पुरोध गणेशशंकर विद्यार्थी और साहित्यकार प्रताप नारायण मिश्र के सानिध्य में आने पर श्यामलाल जी ने जनसेवा शुरू करते हुए खुद को कर्मठ स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी के रूप में स्थापित कर लिया।

आठ मर्तबा जेल गए, आजादी मिलने तक नंगे पांव रहे

कानपुर की जिला कांग्रेस के बैनरतले क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रहने के कारण अंग्रेज हुकूमत ने क्रांतिकारी श्यामलाल को ‘नमक आंदोलन’ तथा ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान जेल भेज दिया। असहयोग आंदोलन में सक्रिय भूूमिका के कारण उन्हें गिरफ्तार करने के बाद आगरा जेल भेज दिया गया था। कुल आठ मर्तबा गिरफ्तारी के कारण श्यामलाल गुप्ता की जिंदगी के छह साल जेल में गुजरे। आजादी की लड़ाई के दौरान श्यामलाल ने संकल्प लिया था कि देश की गुलामी खत्म नहीं होने तक नंग पांव ही रहेंगे। आजादी के बाद वर्ष 1952 में वह ऐतिहासिक क्षण आया, जब पार्षदजी ने लालकिले की प्राचीर से अपना प्रसिद्ध ‘झंडा गीत’ गाया। 1973 में ‘पद्म श्री’ पुरस्कार लेने के लिए श्यामलाल गुप्ता को दिल्ली बुलाया गया तो उधार की धोती पहनकर मंच पर पहुंचे थे। ईमानदारी की मिसाल श्यामलाल की इस स्थिति को देखकर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भावुक हो गई थीं। सरकार ने मदद करनी चाही, लेकिन श्यामलाल ने स्वीकार करने से इंकार कर दिया। 10 अगस्त 1977 की रात को 81 वर्ष की अवस्था में कानपुर के जनरलगंज मोहल्ले में श्यामलाल गुप्ता दुनिया को अलविदा कह गए।

झंडा ऊँचा रहे हमारा

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
झंडा ऊँचा रहे हमारा।
सदा शक्ति बरसाने वाला,
प्रेम सुधा सरसाने वाला
वीरों को हरषाने वाला
मातृभूमि का तन-मन सारा,
झंडा ऊँचा रहे हमारा।

स्वतंत्रता के भीषण रण में,
लखकर जोश बढ़े क्षण-क्षण में,
काँपे शत्रु देखकर मन में,
मिट जावे भय संकट सारा,
झंडा ऊँचा रहे हमारा।

इस झंडे के नीचे निर्भय,
हो स्वराज जनता का निश्चय,
बोलो भारत माता की जय,
स्वतंत्रता ही ध्येय हमारा,
झंडा ऊँचा रहे हमारा।

आओ प्यारे वीरों आओ,
देश-जाति पर बलि-बलि जाओ,
एक साथ सब मिलकर गाओ,
प्यारा भारत देश हमारा,
झंडा ऊँचा रहे हमारा।

इसकी शान न जाने पावे,
चाहे जान भले ही जावे,
विश्व-विजय करके दिखलावे,
तब होवे प्रण-पूर्ण हमारा,
झंडा ऊँचा रहे हमारा।