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#PatrikaSpecial जरा गौर फरमाइये, ये है शहर का पहला स्वर्ण मंदिर

सोने के कलश रखने के बाद लोग इसे कानपुर का पहला स्वर्ण मन्दिर कहने लगे हैं, लेकिन इसकी सुरक्षा के लिए प्रशासन ने किसी तरह की व्यवस्था नहीं की है।

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vikas vajpayee

Sep 12, 2016

siddhnath , the golden temple of kanpur

siddhnath , the golden temple of kanpur

विकास वाजपेयी
कानपुर. उत्तर प्रदेश की आर्थिक राजधानी कानपुर के जाजमऊ में स्थित सिद्धनाथ मंदिर कानपुर के ऐसे मन्दिर की श्रेणी में शामिल हो गया जिसमें भक्तों के सहयोग से 101 किलो के कलश की स्थापना हुई है। सबसे खास बात यह है कि मंदिर में स्थापित इन कलश में 10 किलो सोना लगाया गया है और शेष धातु तांबे की है।

करीब सात दिनों की पूजा के बाद सोमवार को सोने के कलशों को मंदिर के शिखर पर लगाने का काम शुरू किया गया। हलांकि इस कवायद के बीच सिद्धनाथ मंदिर में आस्था रखने वाले भक्तों का कहना है कि सोने के कलश रखने के बाद लोग इसे कानपुर का पहला स्वर्ण मंदिर कहने लगे हैं। लेकिन इसकी सुरक्षा के लिए प्रशासन ने किसी तरह की व्यवस्था नहीं की है।

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अजमेर से बनकर आये सोने के कलश
जाजमऊ गंगा तट पर स्थित सिद्धनाथ के इस मंदिर के शिखर कलश को अजमेर के प्रसिद्ध कारीगर रूपचन्द ने बनाया है। मंदिरों के अरघा और शिखर कलश बनाने में रूपचन्द को काफी अनुभव है और पूरे उत्तर प्रदेश में लगभग 7 मंदिरों में रूपचन्द ने कलश लगाने का काम किया है।

सोने के कलश के लिहाज से सिद्धनाथ मंदिर कानपुर के पहले ऐसे मंदिर में शुमार हो गया है जिसमें मंदिर के ऊपर सोने के कलश स्थापित किये गये है। रूपचन्द के अनुसार इन कलशों का बेस तांबे का है और इसमें 10 किलों के करीब सोने का इस्तेमाल किया गया है।

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हलांकि सुरक्षा की दृष्टि से इसमें कितने सोने का इस्तमाल किया गया है इस बात को आम नहीं किया जा रहा है। और न ही इसकी लागत के विषय में बताया जा रहा है। मंदिर के अन्दर शिव लिंग में भी लगभग लगभग 35 लाख के सोने और चांदी का अरघा है।

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तन पर एक धोती और पैर में चप्पल, ऐसा है ये भक्त
शरीर में एक धोती लपेटे बैठे शिव के भक्त अशोक महेश्वरी पिछले 40 साल से सिद्धनाथ मन्दिर में रोज दर्शन करने आते हैं। और यह शायद ही किसी को मालूम हो कि ये वहीं शख्स हैं जिसका इस कार्य में सबसे बड़ा योगदान है।

अशोक महेश्वरी बताते हैं कि जब उनके पास साईकिल के पैसे नहीं हुआ करते थे, तो वह पैदल ही बाबा के दर्शन करने आते थे। धीरे धीरे ईश्वर की कृपा से आज उनके पास सब कुछ है, लेकिन उन्होंने अपना कभी क्रम नहीं बदला।

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ईश्वर की कृपा का सबसे बड़ा कारण अशोक महेश्वरी की नजर में लोगो की मदद के साथ किसी के साथ अहित न करना है। अशोक बताते हैं कि कई बार सड़क के किनारे लोगों को दुर्घटना में मरते देखा लेकिन किसी के पास इतना समय नहीं रहता कि वह घायल आदमी की जांन बचाएं।

घायल आदमी या फिर स्कूल की फीस न भर पाने के कारण स्कूल न जा पाने वाला बच्चे की मदद के लिए किसी को पीछे नहीं हटना चाहिए। इस तरह भी भगवान को खुश किया जा सकता है। अशोक ने न जाने कितने लोगों को सड़क दुर्घटना में घायल होने के बाद इलाज करा कर उमकी जांन बचाई है।

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कानपुर के पहले स्वर्ण मन्दिर का इतिहास
कानपुर में गंगा किनारे बसे जाजमऊ में स्थित भगवान शिव के मंदिर सिद्धनाथ का इतिहास काफी पुराना है और इतिहासकारों की मानें तो यह मंदिर लगभग दो से ढाई वर्ष पुराना है।

हलांकि ये मंदिर काफी समय तक जीर्णशीर्ण अवस्था में रहने के बाद अंग्रजों के समय फिर से चर्चा में आया। ऐसा बताया जाता है कि 1857 की क्रान्ति के समय इस मंदिर के आस पास बने टीलों का उपयोग क्रान्तिकारी छुपने के लिहाज से करते थे।

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इतिहासकार लक्ष्मीकान्त अपनी पुस्तक में लिखते है कि जाजमऊ का टीला राजा ययाति के किले के रूप में प्रसिद्ध रहा है और इस मंदिर का इतिहास भी इसी काल का है। वहीं इस मंदिर से जुड़ी कई किवदन्तियां भी हैं जिनमें इस मंदिर को बनारस के काशी मंदिर के समकक्ष बताया जाता है।

बार-बार कहने पर भी प्रशासन है बेखबर
वैसे तो देश-प्रदेश के प्रचीन मंदिरों की सुरक्षा की जिम्मेदारी शहर के प्रशासन की होती है, लेकिन सिद्धनाथ मंदिर में सुरक्षा के नाम पर एक सिपाही तक तैनात नहीं किया गया है।

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इस मंदिर की सारी सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था का काम भक्तों के ऊपर है साथ ही मंदिर के आस पास रहने वाले लोग इसकी सुरक्षा करते हैं। लेकिन जिस तरह से मंदिर में सोने के कलश और अरघे का काम हुआ है, उससे इस मंदिर की सुरक्षा एक बहुत बड़ा सवाल बन गयी है।

यहां पर रोज सेवा करने वाले भक्त माञ्झिल का कहना है कि मंदिर के सामने गंगा का भाग पूरी तरह से खुला है और इस तरफ न तो कोई सीसीटीवी लगाया गया है और न ही किसी तरह की सुरक्षा है। साथ ही जिस तरह से भक्त मन्दिर में कुछ न कुछ काम करा रहे हैं उससे यह मंदिर धन के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण हो गया है।