
श्रीकृष्ण ने यहां बाणासुर का किया था वध, आज भी मिलते हैं द्वापर युग के अवशेष
कानपुर देहात-हिन्दू धर्म में सावन माह की बड़ी मान्यता है। भगवान शिव के उपासक इस पूरे माह उनकी आराधना व मनौती मनाते हैं। मंदिर व शिवालयों में घंटों की आवाज़ गूंजती सुनाई देती है। ऐसा ही कानपुर देहात का सोडितपुर का धार्मिक स्थल है, जहां की मान्यता प्राचीन है। बताया जाता है कि भगवान शिव का एक ऐसा भक्त था, जो सुरंग के रास्ते 3 कोस पैदल चलकर मंदिर में जाकर भोले शंकर के शिवलिंग पर जलाभिषेक करता था। इस कथा का पुराणों में भी वर्णन है। आज भी इस ऐतिहासिक मंदिर में उसके अवशेष दिखाई देते हैं।
70 बीघा में था बाणासुर का किला
हम बात कर रहे हैं कानपुर देहात के रसूलाबाद क्षेत्र के अंतर्गत नारायणपुर सोडितपुर गांव की, जहां द्वापर युग के समय बाणासुर का बहुत ही ऐतिहासिक और विशाल किला था। वह बाणासुर की राजधानी थी। बताया जाता है कि 70 बीघे के क्षेत्रफल में बने इस किलेे में बाणासुर का परिवार रहा करता था। उसकी बेटी ऊषा का विवाह प्रद्युम्न के बेटे अनुरुद्ध के साथ हुआ। कहा जाता है कि उसी दौरान नारायणपुर में ही भगवान श्रीकृष्ण व बाणासुर के बीच युद्ध हुआ। भगवान श्रीकृष्ण ने बाणासुर का वध कर दिया। जबकि बाणासुर भगवान शिव का बहुत बड़ा भक्त था। वह अपनी बेटी के साथ लगभग 10 किलोमीटर लंबी सुरंग के रास्ते से पैदल चलकर बनीपारा स्थित बाणेश्वर शिव मंदिर में जलाभिषेक किया करता था। आज भी बारिश होने पर वह सुरंग खेतों पर कहीं कहीं दिख जाती है।
इस खेड़े से निकलते हैं अवशेष
यह भी कहा जाता है कि महल के आसपास उस समय करीब एक सैकड़ा से अधिक पानी के कुए थे, जिसमें से 41 कुएं आज भी मौजूद है। ग्रामीणों ने बताया कि इन कुओं में चरते समय अन्य गांव के जानवर गिर जाते हैं, लेकिन नारायणपुर गांव के जानवर कभी भी उन कुओं में नही गिरे। बारिश के मौसम के बाद इस खेरे पर मानव कंकाल, बहूमूल्य मूर्तियां, मिट्टी के बर्तन आदि अवशेष के रूप में देखने को मिलते हैं। खेड़े पर आज भी किले की आधारशिला है और दीवारें भी देखने को मिलती है। यहां के लोग बताते हैं कि इस समय लगभग 52 बीघा का खेड़ा है। जिसमें कभी बाणासुर का किला हुआ करता था। इसके समीप ही एक विशाल तालाब था, जहां पर बाणासुर की बेटी ऊषा स्नान करने के बाद जलाभिषेक करने के लिए बाणेश्वर शिव मंदिर जिनई जाती थी।
खेड़े से निकली पुरानी मूर्तियां हैं मौजूद
ग्रामीणों ने बताया कि खेड़े में आज भी कहीं पर एक फावड़ा मारने पर विभिन्न प्रकार के जीव देखने को मिल जाते हैं। लेकिन इन जीवों ने किसी को कभी नुकसान नहीं पहुंचाया। स्थानीय लोगों ने बताया कि खेरे से निकली बहुत ही पुरानी व हजारों साल पुरानी मूर्ति आज भी मंदिर में मौजूद है। उन्होंने बताया कि स्वपन देकर खुदाई करने पर विभिन्न प्रकार की मूर्तियां इस खेड़े से निकली है। नारायणपुर में स्थित यह मंदिर आज भी आस्था व विश्वास का प्रतीक बना हुआ है। आज भी लोग यहां दर्शन के लिए सावन के महीने में आते हैं। सोणितपुर को लोग अब नारायणपुर के नाम से जानते हैं।
Published on:
13 Jul 2020 02:29 pm
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