
ग्वालियर के राजा को भाए थे अटल, 75 रूपए देकर भेजा था कानुपर
कानपुर। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की तबियत बिगडने पर उन्हें एम्स अस्पताल में एडमिट कराया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर कई दिग्गज नेता उन्हें देखने के लिए एम्स पहुंच रहे हैं। वहीं इसकी खबर जैसे ही कानपुर आई तो पूरा शहर फिर से रो पड़ा और सावन के माह में भगवन शिव से उनके जल्द से जल्द स्वस्थ होने के लिए दुआवों और पूजा-पाठ के साथ दौर जारी हो गया। बीजपी के साथ ही अन्य विपक्षी दलों के नेता भी देश की अमोल धरोहर के लिए ठीक के लिए ईश्वर से प्रार्थना की। अटल जी को जहां पूरा देश प्यार करता है तो दूसरी तरफ मैनचेस्टर ऑफ इस्ट से उनका गहरा नाता है। बीएनएसडी कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल अंगद सिंह कहते हैं कि अटल बिहारी बाजपेयी अपनी कुशाग्रता से भले ही भारत रत्न से लेकर प्रधानमंत्री के गौरव को छुआ हो पर उनका शैक्षणिक जीवन बहुत कठिन रहा है। कानपुर में राजनीति शास्त्र की पढ़ाई के लिए ग्वालियर के राजा ने उन्हें 75 रूपए की छात्रवृत्ति देकर भेजा था। वह अपने पिता के साथ एक कमरे में रहे और एक ही क्लास में बैठकर पढ़ाई की। अटल जी और उनके पिता जी डीएबी कॉलेज से एलएलबी की थी।
बीमारी के बाद अटल ही अटल
पिछले कईदिनों से पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी बीमार चल रहे थे। गुरूवार को उनकी ज्यादा गंभीर हुई तो उन्हें एम्स लाया गया। जहां डॉक्टरों की निगरानी में बीजेपी के वटवृक्ष का इलाज डॉक्टर्स कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर कई बड़े नेता उन्हें देखने के लिए एम्स जा रहे हैं, वहीं अपने झाडे रहो कल्क्टरगंज के जल्द से जल्द स्वस्थ होने के लिए लोग पूजा-पाठ और दुआएं मांग रहे हैं। अटल जी का इस शहर से गहरा रिश्ता रहा है। यहीं से उन्होंने शिक्षा-दिक्षा गृहण की और आरएसएस से जुड़ने के बाद राजनीति में कदम रखा। कहा जाए तो पढ़ाई के साथ सियासत दोनों उन्हें कानपुर से मिली। अटल जी के मित्र पन्नालाल ताम्बे के बेटे कृष्णालाल ताम्बे बताते हैं कि अटल जी जब डीएवी कॉलेज में पढ़ने के लिए शहर आए तो उनकी मुलाकात हमारे पिता जी से हो गई और दोनों के बीच दोसती हो गई। वो अक्सर आते और पिता जी के साथ बैठकर तुअर की दाल व चूल्हे की पकी रोटी खाते।
1924 में हुआ था जन्म
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म 25 दिसम्बर 1924 को ग्वालियर के गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ था। स्नातक तक की शिक्षा उन्होने ग्वालियर से ही पूरी की। इसके बाद राजनीति शास्त्र की डिग्री के कानपुर का रूख किया पर रूपया हाथो आड़े आ गया। यह बात वहां के तत्कालीन राजा जीवाजीराव सिंधिया के पास जब पंहुची तो उन्होंने अटज जी को छात्रवृत्ति देने का फैसला कर दिया। जिसके मुताबिक उन्हे हर माह 75 रूपए मिल जाते थे और इन्ही रूपयों के बदौलत बाजपेयी कानपुर के डीएवी कॉलेज से लगभग चार साल तक शिक्षा ग्रहण किया। कॉलेज के प्रोफेसर अनूप सिंह बताते हैं कि, अटल जी ने 1945-46, 1946-47 के सत्रों में यहां से राजनीति शास्त्र में एमए किया। जिसके बाद 1948 में एलएलबी में प्रवेश लिया लेकिन 1949 में संघ के काम के चलते लखनऊ जाना पड़ा और एलएलबी की पढ़ाई बीच में ही छूट गई। बताया कि जब बाजपेयी जी प्रधानमंत्री थे तो कॉलेज के नाम एक पत्र लिखा था जो साहित्यसेवी बद्रीनारायण तिवारी ने संस्थान को सौंप दिया। उस पत्र में कुछ रोचक और गौरवान्वित कर देने वाली घटनाओं का जिक्र है। जिसमें घर की माली हालात ठीक न होने और 75 रूपए की छात्रवृत्ति का भी वर्णन है।
पन्नालाल के चलते मिला रोजगार
पत्र में इस बात का भी जिक्र किया गया है कि कानपुर में एक साल के बाद छात्रवृत्ति न लेने का फैसला लिया गया। जिसके लिए हटिया मोहाल स्थित सीएबी स्कूल में ट्यूशन देने जाते थे। यहां पर अटल जी भूगोल व उनके पिता अंग्रेजी पढ़ाते थे। पन्नालाल के बेटे ने बताया कि अटल जी ने हमारे पिता जी से कहा कि गुरू अब अपने खर्चा खुद उठाना है। तुम अपने घर में जगह दो और हम यहीं पर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाएंगे। पिता जी ने एक कमरा दिया दिया, जहां अटल जी हिन्दी तो उनके पिता जी पढ़ाने के लिए आया करते थे। कृष्णालाल कहते हैं कि अटल जी के पास पड़ोस के रहने वाले राजीन पासवान अपने बेटे को लेकर आए और बोले इसे आप पढ़ाईए और हम रिक्शा के जरिए आपकी फीस देंगे। अटल जी और उनके पिता ने निशुल्क में पासवान के बेटे को ट्यूशन पढ़ाया।
एक साथ पिता-पुत्र आते थे कॉलेज
डीएवी कॉलेज के प्रोफेसर अनूप सिंह बताते हैं, अटल जी ने राजनीति शास्त्र से एमए करने के बाद यहीं पर 1948 को एलएलबी में दाखिला लिया। उनके साथ सरकारी नौकरी से अवकाश प्राप्त पिता पंडित कृष्ण बिहारी लाल वाजपेयी ने भी एलएलबी करने का फैसला कर लिया। बताया कि छात्रावास में पिता-पुत्र एक ही कमरे में रहते थे। विद्यार्थियों के झुंड के झुंड उन्हें देखने आते थे। दोनों एक ही क्लास में बैठते थे। यह देख प्रोफेसरों मे चर्चा का विषय बना रहता था। कभी पिता जी देर से पहुंचते तो प्रोफेसर ठहाकों के साथ पूछते- कहिये आपके पिताजी कहां गायब हैं? और कभी अटल जी को देर हो जाती तो पिताजी से पूछा जाता- आपके साहबजादे कहां नदारद हैं।
दस रूपए का पुरूस्कार मिला
अटल जी ने अपने पत्र में आजादी के जश्न 15 अगस्त 1947 का भी जिक्र करते हुए लिखा है कि छात्रावास में जश्न मनाया जा रहा था। जिसमें अधूरी आजादी का दर्द उकेरते हुए कविता सुनाई। कविता सुन समारोह में शामिल आगरा विवि के पूर्व उपकुलपति लाला दीवानचंद ने उन्हें 10 रुपये इनाम दिया था। अटल जी के बारे में कृष्णलाल बताते हैं कि उन्हें हिन्दी के वे पुरोधा थे। हिन्दी और कविताओं के जरिए वो कॉलेज के छात्रों के सबसे अच्छे दोस्त हुआ करते थे। शाम के वक्त मित्र मंडली के साथ परमठ मंदिर जाते और नांव में सवार होकर दोस्तों को कविताओं के जरिए हंसाया करते थे। बताते हैं, रविवार के दिन भोर पहले हमारे झार आते और बाहर से कहते, पन्नालाल जग जाओ देखो कवि बाहर चाय का इंतजार कर रहा है। पिता जी तत्काल चारपाई छोड़ दरवाजा खोलते और दोनों बैठकर चाय की चुस्की लेते।
यह रहा सियासी कॅरियर
राजनीति में अटल जी ने पहला कदम अगस्त 1942 में तब रखा जब उन्हें और बड़े भाई प्रेम को भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 23 दिन के लिए गिरफ्तार किया गया। डीएवी कॉलेज के दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुडे और कानपुर में ही 1951 में जन संघ की स्थापना के दौरान संस्थापक सदस्य बन गये। पहली बार 1955 में लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन हार का सामना देखना पड़ा। 1957 में जन संघ ने उन्हें तीन लोकसभा सीटों लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से चुनाव लड़ाया। जिसमें बलरामपुर सीट से जीत मिल सकी। 1957 से 1977 तक (जनता पार्टी की स्थापना तक) जनसंघ के संसदीय दल के नेता रहे। 1968 से 1973 तक वे भारतीय जनसंघ के राष्टीय अध्यक्ष पद पर आसीन रहे। 1977 से 1979 तक विदेश मंत्री रहे। 1996 में पहली बार प्रधानमंत्री बने हालांकि यह समय कुछ ही दिनों का रहा। 1998 से 2004 तक फिर प्रधानमंत्री बनने में सफल रहे।
Published on:
16 Aug 2018 12:37 pm
