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1857 की क्रांति में बिठूर का है अहम योगदान, एक जुलाई का दिन था बेहद खास

-बिठूर का नानाराव साहब का स्मारक पार्क दे रहा 1857 क्रांति की गवाही,-1 जुलाई को नानाराव पेशवा की सेना ने अंग्रेजों को कानपुर से खदेड़ा था,-स्मारक पार्क में लगी बलिदानियों की प्रतिमाएं सुनाती बलिदान की दास्तां,

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1857 की क्रांति में बिठूर का है अहम योगदान, एक जुलाई का दिन था बेहद खास

1857 की क्रांति में बिठूर का है अहम योगदान, एक जुलाई का दिन था बेहद खास

पत्रिका न्यूज नेटवर्क
कानपुर. बिठूर (Bithur Kanpur) में बना नाना साहब पेशवा (Nana Sahab Peshva) का महल और एक जुलाई का दिन दोनों इतिहास के पन्नों के दर्ज हैं। हों भी क्यों ना इसी दिन नाना साहब की जांबाज सेना ने कानपुर के कब्जा जमाये अंग्रेजों को खदेड़कर भगा दिया था। इसके बाद नाना साहब को सिंहासन पर बिठाया था। 1857 में देश को आजादी कराने की सबसे बड़ी जंग छिड़ी। चारो तरह क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के विरुद्ध मुहिम छेड़ दी और जंग के मैदान में कूद पड़े थे। हालांकि एक जुलाई को अंग्रेजों के भागने के बाद महज 17 दिन में ही अंग्रेजों ने दोबारा कानपुर पर कब्जा कर लिया था। जिसके बाद बीबीघर का चर्चित कांड हुआ था। 15 जुलाई को अंग्रेज कानपुर की सीमा में दोबारा आ गए। इस पर नाना साहब की सेना और अंग्रेजों की सेना के बीच 16 और 17 जुलाई को महाराजपुर के पास युद्ध हुआ।

रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे आदि अन्य प्रतिमाएं दे रहीं बलिदान की गवाही

मगर 17 जुलाई को अंग्रेजों ने फिर से कानपुर पर कब्जा कर लिया। हालांकि क्रांतिकारियों की अंग्रेजो के विरुद्ध जंग जारी रही और 28 नवंबर 1857 को उन्होंने दोबारा कानपुर पर कब्जा कर लिया। मगर एक सप्ताह में ही अंग्रेजों के हाथों मात खानी पड़ी। कानपुर का यह इतिहास पर्यटन विभाग ने समेटकर बिठूर में संजोकर रखा है। 1857 क्रांति की याद मको समेटे बिठूर में नाना साहब के महल का 2003-04 में जीर्णोद्वार कराया, जिससे पर्यटक आकर क्रांतिकारियों के बलिदान को याद कर सकें। इसलिए यहां 1857 के सभी बलिदानियों की प्रतिमाएं लगी हैं। नाना साहब की बड़ी प्रतिमा के अलावा रानी लक्ष्मीबाई, अजीमुल्ला खान, तात्याटोपे की प्रतिमाएं भी उस क्रांति की याद दिलाती हैं।

पर्यटको को लुभाता है बिठूर का यह नजारा

आधुनिकता के लिए पार्क के अंदर ताल बना है, इसमें चार नौकाएं हैं। लोग नौका विहार का आनंद लेते हैं। यहां बना संग्रहालय आज भी इतिहास दर्शा रहा है। इसमें प्राचीनकाल के सिक्के व नोट हैं। इसके साथ ही भारत-पाकिस्तान के बंटवारे की दुर्लभ फोटो भी हैं। कानपुर लिखने में कई बार किए गए बदलाव की जानकारी भी मौजूद है। इसके अतिरिक्त तात्या टोपे की रिहाई का परवाना भी संग्रहालय में मौजूद है। नानाराव पेशवा स्मारक पार्क के सहायक प्रबंधक ओमेंद्र यादव ने बताया कि नानाराव पेशवा स्मारक के पार्क में पर्यटकों की सुविधाओं के लिए सभी व्यवस्थाएं की गई हैं। इसमें वातानुकूलित कमरे, नौका विहार, झूले, क्रीड़ा स्थल, रेस्टोरेंट की सुविधाएं हैं। जिसका प्रवेश शुल्क मात्र 30 रुपये निर्धारित है।