
...जब आजादी के जुनून को और हवा देने पैदल निकल पड़े थे बापू कानपुर में
कानपुर। महात्मा गांधी का कानपुर से पुराना नाता रहा है. आपको बता दें कि गांधीजी चौथी बार 1921 में कानपुर पहुंचे. वह ज्यादा से ज्यादा से लोगों को जोड़ना चाहते थे. लोग भी गांधीजी के पीछे चलने की चाहत रखते थे. बापू कानपुर नगरी में आजादी के जुनून की धार तेज करने को इस बार पैदल निकल पड़े. वह जुलूस के रूप में मारवाड़ी कॉलेज पहुंचे. हजारों की भीड़ उनके पीछे थी. छज्जों पर महिलाएं और बच्चे गांधीजी की एक झलक देखने को बेताब थे.
कुछ ऐसी है जानकारी
गौरतलब है कि बापू चौथी बार 8 अगस्त 1921 को आए. अगले दिन एक जुलूस के साथ मारवाड़ी विद्यालय पहुंचे, जहां उन्होंने वस्त्र व्यापारियों को संबोधित किया. इसी दिन एक महिला सभा में गांधीजी ने कहा, स्वदेशी के बिना स्वराज संभव नहीं है. महिलाएं खादी पहनना कर्तव्यपारायणता समझें. इसी तरह विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार तथा चरखे का अभिन्न अंग समझें... तभी हम स्वावलंबी बनेंगे. अगले दिन 9 अगस्त को बापू का नागरिक अभिनन्दन किया गया. बापू इसमें खिलाफत आंदोलन के संदर्भ में हिन्दू मुस्लिम एकता, गौ रक्षा तथा स्वदेशी पर बोले.
बहुत अहम था उनका नजरिया
बापू का त्याग, बलिदान तथा अंग्रेजों के प्रति उनका नजरिया बहुत महत्वपूर्ण था. उन्होंने कहा कि यदि अंग्रेजों को भारत में रहना है तो उन्हें हमारे भाईयों अथवा सेवकों की तरह रहना होगा, मालिकों के तौर पर नहीं. बोले हमें जान देना सीखना होगा... यदि हम पर गोली चलाई जाती है उसे सीने पर लेना होगा पीठ पर नहीं.. यहां पर गांधी और क्रांतिकारियों के विचारों में हम समानता पाते हैं. नागरिक अभिनन्दन में आयोजकों ने शौकत अली का नाम नहीं लिया तो बापू ने नाराजगी जताते हुए इसे हिन्दू मुस्लिम एकता के विपरीत बताया.
नायडू की बात सुनकर रूंध गया था गला
बापू की पांचवी यात्रा 23 दिसंबर से 26 दिसंबर 1925 की थी. इस यात्रा के दौरान वे मुख्यता तिलक नगर में हुए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महाधिवेशन का हिस्सा बने. इस यात्रा के दौरान वह मालरोड पर एक स्वदेशी प्रदर्शनी का उदघाटन करते हुए बोले कि ऐसे किसी आयोजन में नहीं जाएंगे जिसमें खादी को स्थान न होगा. कांग्रेस के महाधिवेशन में ही सरोजनी नायडू को कांग्रेस अध्यक्ष पद सौंपा गया. 24 दिसंबर को महाधिवेशन में एक भावुक क्षण आया. सरोजनी नायडू ने दक्षिण अफ्रीका संबंधी प्रस्ताव रखते हुए उनका परिचय दक्षिण अफ्रीका से जोड़कर दिया. बापू रूंधे गले से बोले, यद्यपि मैं भारत में पैदा हुआ लेकिन दक्षिण अफ्रीका ने मुझे गोद ले लिया... अभी जब दक्षिण अफ्रीका प्रतिनिधिमंडल के नेता डा. रहमान बोलने आएंगे तो वे कहेंगे कि वे मुझे आपको सौंप रहे हैं. यह सच है.
दिए थे तीन सुझाव
22 से 24 सितंबर 1929 बापू की छठवीं यात्रा थी. 22 सितंबर 1929 को उन्होंने डिस्ट्रिक्ट तथा म्यूनिसिपल बोर्ड की संयुक्त सभा को संबोधित किया. विषय था स्कूल तथा कॉलेजों में चरखा अनिवार्य करना तथा दूध उपलब्ध्ता की बढ़ती समस्या का निदान. बापू ने सदस्यों को खादी तथा चरखे से संबंधित तीन सुझाव दिए, जिसमें चरखा विशेषज्ञों की शिक्षण संस्थाओं में नियुक्ति, कताई के लिए तकली को प्राथमिकता तथा शिक्षार्थियों को काते गए सूत से कपड़ा बनाने का प्रशिक्षण देना शामिल थे. 24 को गांधीजी ने डीएवी में छात्र सभा को संबोधित किया. स्वागत तत्कालीन प्राचार्य दीवान चंद ने किया.
मालाएं कर दी गईं निलाम
मारवाड़ी कॉलेज सभा में गांधीजी को उम्मीद से अधिक चंदा मिला. अनुकूल माहौल में गांधीजी ने माला पहनाने, साथ में फोटो खिंचाने व आटोग्राफ के लिए पैसे लिए. बाद में उन्होंने पहनी मालाओं को भी निलाम कर रकम जमा की.
अंतिम यात्रा रही कुछ ऐसी
क्राइस्ट चर्च कॉलेज के डॉ. एसपी सिंह बताते हैं कि बापू की अंतिम यात्रा 22 से 26 जुलाई 1934 की रही. इसका उददेश्य दलित कल्याण के कार्यों व प्रयासों को करीब से देखना था. 24 जुलाई को तिलक हाल सम्मेलन को संबोधित किया. अतिम दिन 25 जुलाई को उत्तर प्रदेश आर्य प्रतिनिधि सभा को संबोधित किया. बापू ने आटोग्राफ के 5 रुपए तक लिए. डॉ. चंद्रकांता रोहतगी ने भी उन्हें एक आटोग्राफ के 5 रुपए दिए. आंदोलन फंड एकत्र करने को ही उन्होंने डॉ. जवाहर लाल रोहतगी के घर में दूध के लिए बकरी 101 रुपए में नीलाम कर दी.
Published on:
02 Oct 2018 02:24 pm
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