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अजब-गजब है कानपुर के इस गांव की कहानी, दुल्हन के बदले दुल्हन देनी की परम्परा जारी

सैकड़ों साल से चली आ रही है ककवन के मवांना गांव में साटी पल्टा परम्परा

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The story of this village of Kanpur is strange, the tradition of givin

कानपुर, ’हिंद देश के निवासी सभी जन एक हैं, रंग-रूप, वेशभूषा चाहे अनेक हैं। कवि विनयचंद्र मौदगल्य की यह कविता कानपुर के ककवन विकास खंड के मनांवा ग्राम में जोगियों का डेरा में रहने वाले लोगों पर सटीक बैठती है। जोगियों के बच्चे बचपन से जहरीले सांपों के बीच खेलकर बड़े होते हैं और बीन की धून में दक्ष होने के बाद परिजन उनका विवाह तय करते हैं। लेकिन यहां पर सैकड़ों साल पुरानी परम्परा आज भी ही आजमाई जाती है। जिस घर में बहू लानी होती है तो उसी परिवार में अपनी बेटी को बहू बनाकर भेजना पड़ता है। इस प्रथा को साटी पल्टा कहा जाता है। कोई लड़का व्याह लायक हो, लेकिन उसकी कोई बहन न हो तो वह अपने कुनबे या रिश्तेदार से लड़की उधार लेता है। उसके परिवार में जब लड़की जन्म लेती है, उधार ली गई लड़की के बदले वापस करनी पड़ती हे। अगर यह संभव नही ंतो लड़के को लड़की के घ्यहां घर जमाई बनकर रहना पड़ता है। दोनों पक्षों के बीच तय समय तक लड़के को अपने होने वाली सुसराल में रहकर मवेशी चराने पड़ते हैं।
लड़के को साटी परम्परा से गुजरना होता
कानपुर से 40 किमी की दूरी पर मवांवा गांव है, जहां पर एक हजार जोगी रहते हैं। जोगी पेट पालने के लिए सांपों को पकड़ते हैं और बीन की धून पर उन्हें नचाते हैं। इससे जो पैसा मिलता है उससे अपने परिवार को भरण-पोषण करते हैं। यहां जोगियों के बच्चों की दुनिया भी कुछ अलग ही है। सपेरे के बच्चों के बचपन का खिलौना जिन्दा सर्प होते है। इन जिन्दा सर्प को बच्चे अपना खिलौना मानते है। बच्चा जब ज्यादा रोता है तो उसे खेलने के लिये मां भी बच्चों के सामने सर्प को डाल देती है। इन्ही सर्पो के बीच खेल खेल कर बच्चों का बचपना कट जाता है। नाथ सम्प्रदाय से जुड़ी जोगियों की जाति गांव से दूर अपना डेरा डालती है।इनकी दुनिया चकाचौंध से कोसो दूर है। डेरे के बच्चों की दुनिया उनका डेरा ही होती है। कुछ बड़े हुये तो पिता भाई के साथ जंगलों में सर्प पकड़ने में जुट जाते है। जब विवाह की बारी आती है तो उन्हें कड़़ा इम्तहान देना होता है। लड़के को साटी परम्परा से गुजरना होता है।
क्या है साटी प्रथा
गांव के गोजी कल्लू ने बताया कि सैकड़ों साल से साटी प्रथा चली आ रही है, जिसे पास करने के बाद ही लड़का व्याह होता है। लड़के की उम्र जैसे ही 20 साल की होती है तो उसे सबसे पहले जहरील सांप को अकेले पकड़ना होता है। इसके बाद सांप के दांत तोड़ने के बाद बीन के जरिए नचाना होता है। विवाह तह होने के बाद तीन माह के अंदर तीस हजार रूपए की खुद व्यवस्था करनी होती है। पैसे की व्यवस्था होने के बाद लड़के के परिजनों को अपने घर की बेटी ससुरालवालों को दहेज के रूप देनी होती है। साटी के तहत बहू के बदले बहू देना होता है। अगर किसी परिवार के घर में लड़की नहीं हैं तो उसे अपने ही परिवार से उधार लड़की लेनी होती है। जब उनके घर बेटी का जन्म होता है तो वह उधार ली गई लड़की को उन्हें सौंप देते हैं।
नहीं तो चराने पड़ते हैं मवेशी
कल्लू ने बताया कि अगर कोई लड़का पक्ष लड़की नहीं दे पाता तो उसे ससुराल में जाकर घर जमैया बनकर रहना होता है। लड़की पक्ष के लोगों का पूरा खर्चा वहीं उठाता है। उसे घर के मवेशियों को चाराना पड़ता है। ज बवह पिता बनता है तो अपनी बेटी को ससुराल को देकर फिर पत्नी को विदा करा अपने घर ला पाता है। गांव के बिल्लू ने बताया कि उसके परिवार में बेटी नहीं होने के चलते वह करीब तीन साल से ससुराल में रहकर पत्नी के परिजनों की सेवा कर रहा है। खाली समय में मवेशी चराता है और त्योवहारों में मंदिरों में जाकर सांपों को नचाता है। शिवरात्रि पर्व पर बल्लू अपने ***** के साथ आन्नदेश्वर , खेरेश्वर, सहित कई शिवमंदिर के बाहर सांपों को नचाता है। बल्लू ने बताया कि श्रृवण मास के साथ ही शिवरात्रि में हम अच्छा खासा पैसा कमा लेते हैं, जिससे पत्नी और उसके परिवार का गुजर‘बसर होता है। बल्लू ने बताया कि हमारे यहां बच्चा जब रोता है तो उसे खेलने के लिये सर्प दे दिया जाता है। सर्पो के साथ खेलने में कटा बचपन किशोर अवस्था में आते आते सर्प पकड़ने में लग जाता है।
तो डेरे पर ढोलक नही बजती
सपेरो की बस्ती में जब किसी के घर बच्चा जन्म लेता है। तो डेरे पर ढोलक नही बजती है। परम्परा के अनुसार इनकी बस्ती में बीन बजाकर ही जश्न मनाया जाता है। बीन की धुन पर साप को नचाते है। कहते है डेरे पर भगवान शंकर की कृपा रहती है। तो भगवान शंकर को खुश करने के लिये बीन बजाई जाती है। डेरे में बच्चा के जन्म लेते ही उसके पास एक सर्प रखा जाता है। जिससे माना जाता है कि बच्चा डरता नही है। चारपाई के पास ही सर्प की पिटारी को रखा जाता है। छठी के दिन बच्चे के हाथों से सर्प छुआया जाता है। साथ ही बीन भी हाथों में दी जाती है। जोगी का लड़का जैसे ही सात वर्ष की उम्र में अपना पैर रखता है। उसे बीन बजाने की कला को सिखाना शुरु कर दिया जाता है। पांच साल तक उसे बीन बजाना व उसमें धुन निकालने की कला सिखाई जाती है। बीन में सुरो का ज्ञान कराया जाता है। बीन के साथ सर्प को कैसे नचाते है वह भी बताया जाता है।