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इस गांव में नहीं होता है तेरहवीं संस्कार, लोगों के निधन पर की जाती है शोक श्रद्धांजलि, कुछ ऐसी है प्रथा

इस प्रथा को समाप्त करने के लिए गांव के लोगों ने संकल्प लिया है।

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इस गांव में नहीं होता है तेरहवीं संस्कार, लोगों के निधन पर की जाती है शोक श्रद्धांजलि, कुछ ऐसी है प्रथा

इस गांव में नहीं होता है तेरहवीं संस्कार, लोगों के निधन पर की जाती है शोक श्रद्धांजलि, कुछ ऐसी है प्रथा

कानपुर देहात-व्यक्ति के निधन के बाद उसकी आत्मा की शांति के लिए तेरहवीं संस्कार या मृत्यु भोज की प्रथा चली आ रही है। लोग इस प्रथा को भली भांति निभाते हैं, लेकिन अब काफी लोग इस प्रथा से विरत हो रहे हैं। इसकी बजाय अब लोग दिवंगत आत्मा की शांति के लिए शांति पाठ करते हैं। ऐसा ही एक गांव कानपुर देहात में फरीदपुर निटर्रा है। इस गांव में लोग तेरहवीं संस्कार व मृत्युभोज नहीं करते हैं। इस प्रथा को समाप्त करने के लिए गांव के लोगों ने संकल्प लिया है। उनका मानना है कि एक दुखित परिवार किसी के निधन पर भोज कैसे करा सकता है। भोज कार्यक्रम निधन पर शोभायमान नहीं होता है। इसलिए यहां लोग इसे अभिशाप मानते हैं। इसके लिए अलंकृत जनकल्याण सेवा समिति द्वारा यह अभियान चलाया जा रहा है। समिति की पहल पर ग्रामीणों ने मृत्यु भोज न करने का संकल्प लिया है। ग्रामीणों ने कहा इस अभियान के द्वारा लोगों को भी जागरूक किया जाएगा।

दरअसल कानपुर देहात के डेरापुर तहसील क्षेत्र के फरीदपुर निटर्रा गांव में दिवंगत महिला रामश्री निषाद का शोक दिवस था। लेकिन समिति की जागरूकता मुहिम में सम्मिलित परिवार द्वारा तेरहवीं संस्कार की बजाय श्रद्धांजलि सभा की गई। निषाद वर्ग बाहुल्य इस गांव में लोग अब इसी परम्परा को निभा रहे हैं। ग्रामीण इस परंपरा को सराहनीय बता रहे हैं। उनके मुताबिक किसी पारिवारिक सदस्य के निधन पर परिवार शोकाकुल होता है। इस दौरान कई घरों से भोजन दिया जाता है इसलिए उस द्रवित परिवार द्वारा भोज कराने की कुप्रथा समाप्त होनी चाहिए। गांव के युवाओं ने कहा इस परम्परा का बहिष्कार कर इसके खिलाफ अभियान भी चलाएंगे। ये सामाजिक जागरूकता की पहल है, जिसे आगे बढ़ाया जाएगा।