
A woman fell into a coma after jumping from a road pit
कानपुर। किसी बड़े हादसे या किसी अन्य वजह से सिर के एक खास हिस्से पर चोट लगने से व्यक्ति कोमा में चला जाता है। ऐसी हालत में शरीर पूरी तरह बेजान होता है, पर दिमाग कुछ प्रतिशत तक काम करता है। कोमा की स्थिति में व्यक्ति सुन तो सकता है पर जवाब नहीं दे सकता। अभी तक चिकित्सा विज्ञान में अभी तक ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, जिससे यह बताया जा सके कि मरीज कोमा से बाहर कब आएगा। हालांकि गणेश शंकर विद्यार्थी मेमोरियल (जीएसवीएम) मेडिकल कॉलेज के न्यूरो सर्जरी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. राघवेंद्र गुप्ता ने शोध के जरिए इसका अनुमान लगाने में 60 फीसद सफलता हासिल कर ली है।
एमआरआई से पता चलती है चोट
हादसे के दौरान सिर में आयी चोट का कई बार सीटी स्कैन जांच में पता नहीं चलता और जब एमआरआइ जांच कराई जाती है तो मरीजों के ब्रेन में गंभीर चोट का पता चलता है। कोमा के शिकार ६० फीसदी मरीजों के ब्रेन के अंदरूनी हिस्सों में चोट का पता चलता है। कई मरीजों के तो सॉफ्ट टिश्यू तक प्रभावित होते हैं और छोटे-छोटे हिस्सों के खून के थक्के जम जाते हैं।
दो सौ मरीजों पर किया अध्ययन
जीएसवीएम के डॉ. राघवेंद्र गुप्ता ने भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स, दिल्ली) एवं ग्वालियर मेडिकल कॉलेज (जीएमसी) के विशेषज्ञों के साथ दो साल तक कोमा में गए दो सौ मरीजों का अध्ययन किया। एमआरआइ कराकर ग्रेङ्क्षडग निर्धारित की और अनुमान लगाया गया कि मरीज कोमा से कब बाहर आएगा। 60 फीसद केस में आंकलन सही साबित हुआ।
चोट की ग्रेडिंग से तय किया कोमा से बाहर आने का समय
डॉ. राघवेंद्र बताते हैं कि दो वर्षों तक अध्ययन के दौरान मरीजों के ब्रेन में लगी चोट के हिसाब से ग्रेङ्क्षडग की गई। इसी के अनुसार कोमा से बाहर आने का समय निर्धारित किया गया। जिसमें 60 फीसद मरीजों पर आकलन सटीक रहा। उन्होंने बताया कि गहरे हिस्से में चोट के मरीज को ग्रेड-1 श्रेणी में रखा गया। ग्रेड-दो में वे मरीज शामिल किए गए, जिनके ब्रेन के कॉरपस कैलोशम में खून के थक्के व चोटें थीं। ग्रेड-3 की श्रेणी में नाजुक मरीज रखे, जिनके ब्रेन स्टेम में चोट थीं। जीएसवीएम के न्यूरो सर्जन ने एम्स दिल्ली एवं ग्वालियर के विशेषज्ञों के साथ मिलकर इसका अध्ययन किया।
Published on:
22 Oct 2019 01:53 pm
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