1 फ़रवरी 2026,

रविवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

कम्यूनिस्टों को मजूदरों का शहर भाया, इस नारे के चलते ढह गया लाल किला

परेड ग्राउंड में रखी गई थी 1925 को नींव, 1989 के बाद सुभाषनी अली के सांसद बनने के बाद पतन की शुरूआत

3 min read
Google source verification
परेड ग्राउंड में रखी गई थी 1925 को नींव, 1989 के बाद सुभाषनी अली के सांसद बनने के बाद पतन की शुरूआत

कानपुर। कानपुर। देश में अंग्रेजों की हुकूमत थी, बावजूद लाल झंड़े की पकड़ कानपुर में कमजोर नहीं पड़ी। आजादी के बाद से कम्यूनिस्टो का गढ़ मजदूरों का शहर बना। यहां से यहां से लगातार चार बार मजदूर नेता एसएम बनर्जी सांसद चुने गए तो कॉमरेड संत सिंह यूसुफ विधायक बने। पर 1989 कका लोकसभा चुनाव सुभाषनी अली के जीतने के बाद लाल किले में सेंध लगनी शुरू हो गई जो 2018 तक लेफ्ट मैनचेस्टर ऑफ इस्ट ही नहीं कई राज्यों से बेदखल हो गया। अपनी खोई जमीन पाने के लिए कभी जेएनयू में वामपंथी छात्रसंघों से टकराव और कभी केरल में राजनीतिक उलझनों के बीच अक्सर लेफ्ट पार्टियों की चर्चा होती है, लेकिन जिस जिले में इसकी नींव रखी गई वहां पिछले 29 साल से सन्नाटा पसरा है। मजदूर युनियनों के बड़े गुट राजनीतिक दलों से जुड़ गए, जो बचे वह भी वह सड़कों में निकलने के बजाए अपनी रोजी-रोटी के लिए कारखानों में काम कर रहे हैं। मजदूर नेता कामरेड राजेश पांडेय बताते हैं कि 1989 सुभाषनी अली के सांसद चुनने के बाद लेफ्ट की उल्टी गिनती शुरू हो गई। 1991 के दौरान शहर के चाक-चौराहे और दिवारों पर भाजपा के नेताओं ने नारे लिखवाए, अब तो चर्चा गली-गली, सहगल से कब बनी अली’। इसी के बाद भाजपा सहित अन्य राजनीतिक दलों ने कानपुर में कब्जा कर लिया और लाल किला ढह गया।
परेड ग्राउंड में रखी गई थी लाल झंडे की नींव
इतिहासकार मनोज कपूर बताते हैं कि 1917 में रूस में बोलशेविक दल ने जनक्रांति कर जारशाही को हटा दिया था। इसका असर अंग्रेजों से लड़ रहे भारत तक हुआ। इस विचारधारा से प्रभावित होकर कुछ किताबों के अलावा अखबारों में लेख छपे। 1920 के आसपास औपचारिक तौर पर भारत में कम्यूनिज्म का प्रचार शुरू हो गया। इसी दौरान मजदूर यूनियनों को मिलाकर ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) बनाई गई। 1 सितंबर, 1924 को कॉमरेड सत्यभक्त ने इंडियन कम्यूनिस्ट पार्टी की स्थापना का ऐलान कर दिया। कानपुर में नारायण प्रसाद अरोड़ा, मौलाना हसरत मोहानी और रमाशंकर अवस्थी आदि को जोड़कर एक प्रोविजनल कमिटि बनाई गई। सत्यभक्त खुद इसमें मंत्री बने। अन्य सदस्यों के नाम प्रचारित नहीं किए गए। इसके बाद सरकारी दमन शुरू हो गया लेकिन बाद में अंग्रेजों ने इस आंदोलन को बेअसर माना। 1925 में परेड ग्राउंड में कांग्रेस के 40वें अधिवेशन के साथ कम्यूनिस्टों ने पहली ऑल इंडिया कम्यूनिस्ट कॉन्फ्रेंस करने का फैसला किया और उसी दिन लाल झंडे की स्थापना की दी।
बनर्जी लगातार चार बार चुने गए थे सांसद
इतिहासकार मनोज कपूर के अनुसार, कानपुर में मजदूर ने आंदोलन खड़ा किया था। 30 और 40 के दशक में मजदूरों के बीच कांग्रेसी नेता जवाहर लाल रोहतगी और अन्य की जड़ें गहरी थीं। ये प्रयास दलगत नहीं व्यक्तिगत थे। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के कारण ये सभी नेता जेल पहुंच गए। बस यहीं से वाम नेताओं ने ट्रेड यूनियनों में प्रवेश कर अपना आधार मजबूत कर लिया। 1964 में सीपीआई के टुकड़े हुए और सीपीआई (मार्क्सवादी) नाम की दूसरी पार्टी अस्तित्व में आई। मजदूर नेता एसएम बनर्जी 1957 से 1977 तक लगातार चार बार निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में कानपुर के सांसद चुने गए। 60 के दशक में मजदूर बहुल गोविंदनगर विधानसभा सीट से कॉमरेड संत सिंह यूसुफ दो बार जीते। लाल क्रांति के बीच कानपुर के उद्योगों में श्रमिक असंतोष के बीच हिंसा की छिटपुट घटनाएं जारी रहीं। स्वदेशी कॉटन मिल में 1977 में पुलिस फायरिंग में 11 मजदूरों समेत 13 लोग मारे गए।
धरने के बाद उखड़ गई जमीन
मनोज कपूर ने बताया कि 1989 में सीपीआई(एम) नेता कॉमरेड सुभाषिनी अली जनता पार्टी के सहारे कानपुर से पार्लियामेंट पहुंचीं। केके पांडेय अवॉर्ड की 14 हजार मजदूरों की छंटनी की सिफारिश के विरोध में 1989 में ही जूही में कॉमरेड सुभाषिनी अली के नेतृत्व में 107 दिनों तक यूनियनों का धरना चला। इसके बाद कानपुर में कभी वामपंथी नेताओं को चुनावों में सफलता नहीं मिली। कानपुर के वापमंथी नेता इस आंदोलन में लगे कार्यकर्ताओं को आंदोलनकारियों की आखिरी लॉट बताते हैं। कॉमरेड स्वरूप के अनुसार, कानपुर में लेफ्ट पार्टियों का आधार मजदूर थे, लेकिन जानबूझकर टेक्सटाइल मिलों को कमजोर कर बंद करा दिया गया। ज्यादातर फैक्ट्रियां निजी हाथों में थीं। वामपंथी पार्टियों ने ही लड़कर नैशनल टेक्सटाइल्स कॉरपोरेशन (एनटीसी) बनवाई। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के फैसले से ही पूरे देश में करीब 135 मिलें बंद हो गईं। वास्तव में पूंजीपतियों ने कामगारों को हरा दिया। इसके बाद आए मंडल कमिशन और राम मंदिर आंदोलन ने हमें कमजोर किया। वामपंथी पार्टियां कभी जाति-धर्म के नाम पर वोट नहीं मांगतीं। यूपी में उस दौर तक कई पॉकेट्स में हम काफी मजबूत थे। 1952 के चुनाव में तो एसएम बनर्जी को हराने के लिए खुद जवाहर लाल नेहरू आए थे।

Story Loader