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अनदेखी से लाइलाज हो जाता बच्चेदानी का कैंसर

  थोड़ी सी सक्रियता बचा सकती है महिलाओं की जिंदगी एक आसान जांच से बीमारी का चल जाता है पता          

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uterus cancer

अनदेखी से लाइलाज हो जाता बच्चेदानी का कैंसर

कानपुर। देश में हर साल करीब 60 हजार महिलाओं की बच्चेदारी के कैंसर से हो रही है। बीमारी के प्रति महिलाओं की अनदेखी इसे और गंभीर बना देती है और स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाती है। खास तौर पर चार तरह के कैंसर महिलाओं की जान ले रहे हैं। लेकिन अगर जागरूकता बढ़ाई जाए तो इन मौतों पर काबू पाया जा सकता है और ऐसा हो भी रहा है। शहर के मेडिकल कॉलेज में आयोजित कैंसर के विरुद्ध एक अग्रिम कदम कार्यशाला में नई दिल्ली से आई कैंसर रोग विशेषज्ञ डॉ. शालिनी राजाराम ने कई अहम जानकारियां दीं। यह कार्यशाला एसोसिएशन ऑफ गायनीकॉलोजी अंकोलॉजी ऑफ इंडिया के संयोजन में हुई।

चार तरह के कैंसर
कैंसर रोग विशेषज्ञ डॉ. शालिनी ने बताया किचार तरह के कैंसर होने की सबसे अधिक आशंका महिलाओं में होती है। पहले नम्बर में ब्रेस्ट कैंसर उसके बाद बच्चेदानी के मुंह का कैंसर (सर्विक्स कैंसर), बच्चे दानी का कैंसर और ओवरी का कैंसर प्रमुख है। हर महिला को शादी के बाद 25 या 30 वर्ष की उम्र होते-होते हर पांच साल पर अपनी जांच करानी चाहिए। जिससे समय रहते बीमारी का पता चल जाता है और उसे दूर करने में मदद मिलती है। मगर महिलाएं इस पर ध्यान नहीं देतीं।


हर तरह का डिस्चार्ज सामान्य नहीं
राजीव गांधी कैंसर संस्थान की विशेषज्ञ डॉ. रूपेन्द्र शेखों ने कहा कि किसी भी तरह के डिस्चार्ज को महिलाएं सामान्य मान लेती हैं मगर ऐसा नहीं है। इसके प्रति सतर्क रहना चाहिए। अब तो मामूली जांच की सुविधा सरकारी अस्पतालों में भी उपलब्ध है। गर्भाशय, ओवरी और गर्भाशय के मुख के कैंसर की जांच बड़ी आसान है। एएनएम भी इसकी जांच कर सकती है। एसिटो एसिड जांच में एक ड्राप दवा डालने पर कैंसर की आशंका का भी पता चल जाता है।


बचाव का टीका भी उपलब्ध
इस बीमारी से सुरक्षित करने के लिए टीका उपलब्ध है। 9 से 15 वर्ष की बच्चियों को एचपीवी टीका लगवाएं। विशेषज्ञों के मुताबिक इस टीके से 75-80 फीसदी बीमारी से बचने की संभावना रहती है। देश के कई प्रदेशों से आई विशेषज्ञों ने कैंसर सर्जरी की विभिन्न तकनीकों पर चर्चा की। डॉ. शालिनी राजाराम ने कहा कि सर्जरी और इलाज की विभिन्न तकनीक जो इस समय देश में उपलब्ध है वह दुनिया के विकसित देशों में भी उपलब्ध है। जो तकनीक विश्व में अपनाई जा रही है वह भारत में भी अपनाई जा रही है इसलिए लोगों को इलाज के लिए भटकने की जरूरत नहीं।.