
आखिर इसे क्यों कहा जाता है छोटी गया, पितृपक्ष में यहां पिंडदान से तर जाते हैं पूर्वज, क्या है इसकी पूरी दास्तां
कानपुर देहात-पितृपक्ष सन्निकट हैं। पंद्रह दिन चलने वाले इस पक्ष में लोग अपने घरों में विधि विधान से अपने पूर्वजों का श्राद्ध करते हैं। जबकि कुछ लोग गंगा, यमुना जैसी पवित्र नदियों में स्नान कर पिंडदान करते हैं। उनका मानना है कि इस प्रकार पिंडदान करने से पूर्वज तर जाते हैं। कहा जाता है कि इन अशुभ दिनों में कोई शुभ कार्य नहीं किये जाते हैं। कानपुर देहात के मूसानगर स्थित देवयानी सरोबर पितृपक्ष के दिनों में बहुत ही बड़ा महत्व है। इन दिनों में देवयानी सरोबर में भारी संख्या में लोग स्नान करने आते है और लोग वहां पिंडदान भी करते हैं। लोगों की मान्यता है कि देवयानी सरोबर में स्नान व पिंडदान करने से गया जाने का फल प्राप्त होता है। जो पूर्वज जीते जी गया जाकर दर्शन नहीं कर पाये, इस प्रकार से पिंडदान करने से उन्हें मुक्ति मिलती है और वो तर जाते हैं।
इस सरोबर को छोटी गया का दर्जा दिया गया
कानपुर देहात के भोगनीपुर चौराहे से मुगल रोड पर 19 किमी दूर मूसानगर कस्बे के मध्य स्थित देवयानी सरोवर बना है, जिसे लोग छोटी गया भी बोलते है। यहां पितृपक्ष में भारी तादात में लोग आते हैं और स्नान करके पितरों का पिंडदान करते हैं। दूर दराज जनपदों से आने वाले लोग रात्रि में यहां बसेरा करके सुबह भोर में उठकर स्नान ध्यान कर विधि विधान से उत्तरायन में बने तट पर सिर मुंडवाकर सरोवर में श्राद्ध की सारी क्रियायें पूर्ण करते हैं। कई वर्षाें से लोग इस सरोबर में आकर श्राद्ध, तर्पण व पिंडदान करते हैं। कहा जाता है इससे छोटी गया का फल प्राप्त होता है।
इस सरोबर की है प्राचीन कहानी
लोगों की मान्यता है कि, वर्षाें पूर्व देवयानी सरोवर के पास एक घना जंगल था। जहां दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा व दैत्य गुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी घूमने आयी थी। उसी दौरान जंगल मे एक सरोबर देख दोनों उसमे स्नान करने लगी। इसी बीच भगवान शंकर का वहां से निकलना हुआ। भोले शंकर को आता देख जल्दबाजी मे देवयानी ने शर्मिष्ठा के कपड़े पहन लिये। जिससे गुस्साकर दैत्यपुत्री शर्मिष्ठा ने देवयानी को समीप बने कुयें मे धक्का दे दिया। कुछ समय बाद कुयें के पास से गुजरे जाजमऊ के राजा यायाति ने चीख पुकार सुनकर देवयानी को बाहर निकाला। इसके बाद गुरु शुक्राचार्य ने राजा यायाति की बहादुरी से प्रसन्न होकर अपनी पुत्री देवयानी की शादी राजा यायाति से कर दी और दैत्यराज वृषपर्वा से नाराजगी जताते हुये चले जाने को कहा, लेकिन राजा यायाति के अनुरोध करने पर शर्मिष्ठा को देवयानी की दासी बनाने की शर्त पर वह राजी हुये। विवाह के बाद राजा यायाति ने इसी सरोबर को भव्य रूप देते हुये उसका नाम देवयानी सरोवर रख कर दिया।
यहां प्रथम पिंडदान आवश्यक है
लोग सरोबर में स्नान श्राद्ध, पिंडदान करते हैं। वहां से करीब 2 किमी दूरी पर दक्षिण दिशा से यमुना जी गुजरी है। इस स्थान पर यमुना जी के उत्तरगामिनी होने से इस स्थान का बहुत बड़ा महत्व है। इसके चलते लोग इसे छोटी गया भी बोलते हैं। जिसे धीरे धीरे मातृ गया की मान्यता मिली। इसलिये लोग पितृपक्ष में बिहार में स्थित गया जाने से पहले मूसानगर स्थित मातृ गया में श्राद्ध व पितरों को पिंडदान करते हैं। लोगों का मानना है कि पूर्वजों की शांति व मोक्ष के लिये छोटी गया में प्रथम पिंडदान आवश्यक है।
Published on:
11 Sept 2019 05:42 pm
बड़ी खबरें
View Allकानपुर
उत्तर प्रदेश
ट्रेंडिंग
