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चंद दिनों में ही सूख जाते हैं एनीकट

चंद दिनों में ही सूख जाते हैं एनीकटकरौली जिले में ग्रामीण विकास और जल संसाधन विभाग इलाके में जलसंरक्षण को लेकर उदासीन है। ये ही कारण है कि गुढ़ाचन्द्रजी. इलाके में एनिकटों का बीते एक दशक से कोई उपयोग ही नहीं हो रहा है। इनमें अधिकांश एनिकट 10 साल या इससे अधिक पुराने है जिनकी दीवारों में दरारें के साथ उनमें मिट्टी का भराव हो गया है। गहराई कम होने के कारण इनमें बरसाती पानी चंद दिन ही ठहर पाता है। इस कारण करोड़ोंं रुपए की लागत से बने एनिकटों उपयोगी साबित नहीं हो रहे हैं।

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चंद दिनों में ही सूख जाते हैं एनीकट

चंद दिनों में ही सूख जाते हैं एनीकट

चंद दिनों में ही सूख जाते हैं एनीकट
जलस्तर बढऩे पर बुझेगी प्यास
करौली जिले में ग्रामीण विकास और जल संसाधन विभाग इलाके में जलसंरक्षण को लेकर उदासीन है। ये ही कारण है कि गुढ़ाचन्द्रजी. इलाके में बने एक दर्जन से अधिक एनिकटों का बीते एक दशक से कोई उपयोग ही नहीं हो पा रहा है। इनमें अधिकांश एनिकट 10 साल या इससे अधिक पुराने है जिनकी दीवारों में दरारें आने के साथ उनमें मिट्टी का भराव हो गया है। गहराई कम होने के कारण इनमें आना वाला बरसाती पानी चंद दिन ही ठहर पाता है। इसके बाद एनिकट सूखा ही पड़ा रहता है। इस कारण करोड़ोंं रुपए की लागत से बने एनिकटों उपयोगी साबित नहीं हो रहे हैं।
क्षेत्र में बोरिंग चौराहे के समीप लगभग डेढ़ दशक पहले 60 लाख रुपए की लागत से बनाए गए एनिकट का आज तक भी उपयोग नहीं हो पाया है। एनिकट में बारिश के दौरान आने वाला पानी एक माह भी नहीं रुकता है। इसी प्रकार पाल नदी में बने आधा दर्जन से भी अधिक एनिकटों की दीवारों में दरारें आ गई है। मिटïïïïïïïïटी से भरने से उनकी भराव क्षमता नाममात्र की रह गई है। इस कारण बारिश में पहाड़ों से एकत्रित होकर आने वाला पानी बह जाता है। क्षेत्र के लोगों का मानना है कि अगर एनिकटों की मरम्मत के साथ गहराई बढ़ाने के लिए खुदाई करा दी जाए तो बारिश के पानी का एनिकटों में ठहराव हो सकता है। इससे एनिकटों में पानी भरने से जलस्तर की बढ़ोतरी होगी जिससे आसपास के कुएं, हैण्डपंप, नलकूप आदि में पानी उपलब्ध हो सकेगा।
सरकार ने एक दशक पहले क्षेत्र का जलस्तर बढ़ाने व वन्यजीवों की प्यास बुझाने के लिए करोड़ों रुपए खर्च कर एनिकटों का निर्माण करवाया था। लेकिन ये एनिकट उपयोगी नहीं साबित नहीं हुए।