
अलविदा कर्नल बैंसला- जवानी में सरहद पर दिखाई जाबांजी,वृद्धावस्था में समाज को दी मजबूती
हिण्डौनसिटी.
दुनिया से अलविदा हुए कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला गुर्जर समाज के उत्थान के लिए संघर्ष की मिसाल बन गए। जवानी में उन्होंने शिक्षक से फौजी बन सरहद पर युद्धों में जाबांजी दिखाई और बुजुर्ग होने पर समाज को नई दिशा देने के लिए संघर्ष किया।
दो दशक के संघर्ष में कर्नल बैंसला ने कई बार ट्रेनों को रोककर सरकार से आरक्षण का बूस्टर डोज दिलवाकर समाज की नींव मजबूत करने का काम किया।
वर्ष 1991 में सैन्य अफसर के पद से सेवानिवृत हो कर्नल बैंसला पैतृक गांव मूडिया लौट आए। वर्ष 1994 में उनकी पत्नी रेशम देवी ग्रामपंचायत मूडिया की सरपंच निर्वाचित हुई। दो वर्ष बाद ही पत्नी के निधन के बाद बैंसला ने गुर्जर से अशिक्षा और पिछड़ापन दूर करने का ताना बुनना शुरू कर दिया। उन्होंने समाज को मुख्य धारा में लाने के लिए अनुसूचित जाति के समान आरक्षण के लिए जनजागरण अभियान चला गुर्जर समाज लामबंद किया।
सैकडों गांवों में 500 से अधिक बैठकें कर वर्ष 2005 में गांव पीपलखेडा में गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति का गठन कर 3 सितंबर 2006 को दिल्ली-मुम्बई-रेल मार्ग पर हिण्डौन में महवा रेल फाटक (अब ओवर ब्रिज) पर रेल रोको आंदोलन का आगाज कर दिया। हिण्डौन से फूंके आंदोलन के बिगुल से देश भर का गुर्जर समाज कर्नल की आवाज पर खड़ा हो गया। कई बार हुए रेल रोको सहित विविध प्रकार के आंदोलनों से 5 प्रतिशत आरक्षण की राह प्रशस्त हुई। कर्नल बैंसला नई पीढ़ी को उत्थान के लिए समाज में कुरीतियों पर पाबंदी लगाने और बेहतर स्वास्थ्य और अच्छी शिक्षा के लिए प्रेरित करते रहे।
सैनिकों को जोड़ बढ़ाया कारवां
आरक्षण के लिए समाज में जागरुकता लाने के लिए कर्नल बैंसला ने राजनीतिक पहुंच के लोगों की बजाय सेवानिवृत सैनिकों को सथ लेकर का कारवां बनाया। दिवंगत कैप्टन हरप्रसाद तंवर उनके खास सिपहसालार रहे। महापड़ाव हो या रेल रोको आंदोलन, कर्नल ने समाज के आमजन और कमान पूर्व सैनिक साथियो ंके हाथ में कमान रखी।
किताबें पढने के थे शौकीन-
शिक्षक, सैन्य अफसर रहते हुए कर्नल बैंसला को किताबें पढने का शौक था। उनके हिण्डौन के वर्धमान नगर आवास पर किताबों का संग्रह लाइब्रेरी की मानिंद था। अग्रेजी भाषा पर खास पकड़ होने अलमारी में अंग्रेजी साहित्य और विदेशी लेखक और समाज सुधारकों द्वारा लिखी पुस्तकों की बहुलता है। मुलाकात करने वाले अधिकारी भी लाइब्रेरी से पढऩे को किताबें ले जाते थे।
राजनीति में समाज हित को माना सर्वोपरि
गुर्जर आरक्षण आंदोलन से कर्नल बैंसला प्रदेश में राजनीतिक धुरी बन गए। सत्ता के लिए चुनावों में राजनेता और पार्टियां उनके इद्र्ध-गिद्र्ध होती। लेकिन उन्होंने समाज के हित को सर्वाेपरि रखा। वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में कर्नल बैंसला ने टोंक -सवाईमाधोपुर सीट से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा। वहीं वर्ष 2013 के चुनाव में वे कांग्रेस के साथ रहे। बाद में लोकसभा चुनाव से ऐन पहले वे भाजपा में शामिल हो गए।
सैनिक से बने अफसर
टोडाभीम तहसील के छोटे से गांव मूडिया में12 सितंबर 1939 को सैनिक बच्चूसिंह के घर जन्मे किरोड़ी सिंह बैंसला तीन भाइयों में मझले थे। पिता के भारतीय सेना में हवलदार होने से घर में सैन्य माहौल के चलते बड़े भाई मोहरसिंह व छोटे भाई गंगासिंह राजपूत रेजीमेंट में भर्ती हो गए। गांव में प्रारंभिक शिक्षा के बाद किरोड़ी सिंह ने भरतपुर और जयपुर के महाराजा कॉलेज में पढ़ाई की। बैसला 2 वर्ष तक महवा के राजकीय हायर सैकण्डरी स्कूल में व्याख्याता रहे। वर्ष 1962 में चीन से युद्ध के दौरान सेना में भर्ती में हो बड़े भाई मोहरसिंह की 3-राजपूत रेजीमेंट में सैनिक बने। उच्च शिक्षित किरोडी सिंह सेना की आंतरिक परीक्षा पास कर 24 वर्ष की उम्र में बिग्रेड ऑफ गाड्र्स में अफसर बन गए।
पाक के खिलाफ लड़ी जंग
वर्ष 1965 में पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध में फ्रंटलाइन में होने से उन्हें युद्ध बंदी(पीओडब्ल्यू)बना लिए गए। पाक जेल से आने के बाद कर्नल बैंसला सेना की पायोनियर कोर में रहे। उन्होंने पाकिस्तान के खिलाफ वर्ष 1971 के युद्ध में भी भाग लिया। और वर्ष 1991 में कर्नल पद से सेवानिवृत हो गए। बैंसला के बड़े पुत्र दौलतसिंह कर्नल से सेवानिवृत हैं, वहीं मझले बेटे जयसिंह मेजर जनरल हैं। जबकि भाई गंगासिंह के पुत्र हुकमसिंह ब्रिगेडियर हैं। जबकि बैसला की पुत्री के सुनीता बैसला आयकर आयुक्त हैं। छोटे पुत्र विजय बैंसला ने कई देशों कम्पनियों से सेवाएं देने के बाद समाज सेवा में सक्रिय हो हाल ही में गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति की कमान संभाली है।
Published on:
01 Apr 2022 09:00 am
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