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पहाड़ी पर बसा है बरवासन देवी का रियासतकालीन मंदिर

सपोटरा. सपोटरा उपखण्ड मुख्यालय के उत्तर पूर्व की अरावली पहाडिय़ों पर सात किमी दूरी पर स्थित ग्राम पंचायत अमरबाड़ के गांव दुदराई में क्षेत्र की बरवासन देवी ऐतिहासिक शक्तिपीठों में शामिल है। यहां राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, दिल्ली सहित अन्य कई जगह से माता के भक्त पूजा के लिए आते हैं। इन दिनों नवरात्र में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है। रियासतकाल के समय मंदिर का निर्माण हुआ था। सपोटरा के पूर्व विधायक प्रभू पटेल ने बताया कि पूर्व में बरवासन देवी मंदिर पर अलाउद्दीन खिलजी ने अतिक्रमण कर उसे ध्

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पहाड़ी पर बसा है बरवासन देवी का रियासतकालीन मंदिर

सपोटरा के कालीसिल बांध स्थिति बरवासन देवी की प्रतिमा।

पहाड़ी पर बसा है बरवासन देवी का रियासतकालीन मंदिर
सपोटरा. सपोटरा उपखण्ड मुख्यालय के उत्तर पूर्व की अरावली पहाडिय़ों पर सात किमी दूरी पर स्थित ग्राम पंचायत अमरबाड़ के गांव दुदराई में क्षेत्र की बरवासन देवी ऐतिहासिक शक्तिपीठों में शामिल है। यहां राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, दिल्ली सहित अन्य कई जगह से माता के भक्त पूजा के लिए आते हैं। इन दिनों नवरात्र में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है। रियासतकाल के समय मंदिर का निर्माण हुआ था। सपोटरा के पूर्व विधायक प्रभू पटेल ने बताया कि पूर्व में बरवासन देवी मंदिर पर अलाउद्दीन खिलजी ने अतिक्रमण कर उसे ध्वस्त करने की योजना बनाई थी। इस दौरान खिलजी द्वारा माता के मंदिर मे लकडियां भरकर आग लगाने का प्रयास किया, लेकिन माता के प्रभाव से वह अपनी मंशा में सफल नहीं हो सका। मंदिर में खिलजी के आक्रमण के कारण टूटी छत की शिला आज भी है। जो एक पत्थर पर टिकी है। मंदिर में स्थित शिलालेख के अनुसार शाके संवत १८३४ में करौली नरेश भ्रमरपाल के पंडित बालगोविंद ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था।

बरवासन देवी मंदिर के गर्भगृह में कैलादेवी, बिरवासन, चामुण्डा व गणेशजी की मूर्ति स्थापित होने के साथ रणथम्भौर दुर्ग की ३२ खम्भों की छतरी की तर्ज पर मण्डप गृह बना हुआ है। इसके अतिरिक्त सेढ माता,महादेव जी, हनुमानजी तथा ठाकुरजी का मंदिर है। दूसरी ओर पहाड़ पर आमेर का हनुमानजी मंदिर है। पुत्र प्राप्ति की कामना पूरी होने पर यहां सवामणी आदि के आयोजन होते हैं।