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शाही कुण्ड में झलकती है रियासतकालीन शिल्पकला

करौली. शहर में रियासतकालीन ऐतिहासिक स्थलों में भद्रावती नदी के किनारे बने शाही कुण्ड का खासा महत्व है। इतिहासकार वेणुगोपाल शर्मा बताते हैं कि महाराजा प्रतापपाल के शासन में 19वीं शताब्दी के अंतिम दशक में शाही कुण्ड का निर्माण कराया गया था। शुरुआत में कुंड पर रानियों के स्नान की व्यवस्था की गई थी। इसके लिए इसे शाही कुण्ड का नाम दिया गया। बाद में यह शहर की जलापूर्ति के लिए काम आने लगा। कुण्ड के निर्माण के लिए अद्भुत शिल्पकला की गई है। लाल पत्थरों से निर्

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शाही कुण्ड में झलकती है रियासतकालीन शिल्पकला

करौली शहर का शाही कुण्ड।

करौली. शहर में रियासतकालीन ऐतिहासिक स्थलों में भद्रावती नदी के किनारे बने शाही कुण्ड का खासा महत्व है। इतिहासकार वेणुगोपाल शर्मा बताते हैं कि महाराजा प्रतापपाल के शासन में 19वीं शताब्दी के अंतिम दशक में शाही कुण्ड का निर्माण कराया गया था। शुरुआत में कुंड पर रानियों के स्नान की व्यवस्था की गई थी। इसके लिए इसे शाही कुण्ड का नाम दिया गया। बाद में यह शहर की जलापूर्ति के लिए काम आने लगा। कुण्ड के निर्माण के लिए अद्भुत कारीगरी की गई है। लाल पत्थरों से निर्मित इस कुण्ड का कार्य काफी मजबूती से कराया गया है। कुण्ड पर जाली, झरोखे की कारीगरी लुभाती है। इतिहासकार बताते हैं कि इस कुण्ड में पहले हमेशा पानी रहता था। जिससे उस दौर में पानी की समस्या नहीं थी।

सुखविलास बाग से जुड़ा है कुण्ड

शाही कुण्ड के पास ही सुखविलास बाग है, जो शाही कुण्ड से ही जुड़ा है। इस बाग का एक रास्ता कुण्ड और दूसरा रास्ता भद्रावती नदी की ओर खुलता था। रानियां सुखविलास बाग में भ्रमण के बाद शाही कुण्ड में स्नान के लिए पहुंचती थी। बरसात के बाद भद्रावती नदी में पानी की कमी आने के बाद कुण्ड के पानी का उपयोग अन्य कार्यों में भी लिया जाता था। गर्मी के दिनों में कुण्ड के पानी से ही काम चलता था। कुण्ड में कई सीढियां हैं।