
गुढ़ाचंद्रजी. गढ़मोरा गांव में जर्जर महल।
राजा मोरध्वज का महल स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना
गुढ़ाचंद्रजी. समीपवर्ती गढ़मोरा गांव में करीब ५०० वर्ष प्राचीन राजा मोरध्वज के महल व अन्य ऐतिहासिक भवन स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना है। इतिहासकारों के अनुसार यह मंदिर रियासत काल से पहले के हैं, जो हिंदू एवं जैन धर्म पर आधारित है। राजा मोरध्वज के महल, किले, परकोटे आदि राजा के शासनकाल के स्वर्णिम इतिहास को दर्शाते हैं। यहां प्राचीन कुंड भी है। जिसमें मकर संक्रांति सहित अन्य विशेष मौके पर धार्मिक आयोजन होते हैं। श्रद्धालु कुण्डों में स्नान व दान पुण्य करने आते हैं। संक्रांति पर मेला भरता है। कुश्ती दंगल आादि कार्यक्रम होते हैं।
यह दर्शनीय स्थल हैं प्रमुख
गढ़मोरा को राजा मोरध्वज की नगरी के नाम से भी जाना जाता है। यहां राजा के महल के अलावा बौद्ध स्तूप, ८ खंभों पर टिकी छतरी, बौद्ध मंदिर, मकरध्वज मंदिर आदि भी प्राचीन इतिहास को दर्शाते हैं। यह स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूने हैं। प्राचीन हनुमान मंदिर, नारायणी माता मंदिर, देवनारायण भगवान मंदिर, गोपालजी मंदिर प्रमुख हैं। ऐतिहासिक दर्शनीय स्थलों को देखने के लिए पर्यटक आते हैं।
संरक्षण की दरकार
गढ़मोरा पर्यटन विकास समिति सहित आसपास के गांव के लोग करीब एक दशक से इस क्षेत्र को पर्यटन स्थल घोषित करवाने के प्रयास कर रहे हैं। पर्यटन विकास समिति के प्रयासों से सरकार ने बजट जारी किया था। जिससे कुछ विकास कार्य हुए थे। प्राचीन ऐतिहासिक भवन संरक्षण के अभाव में जर्जर हो रहे हैं। सैकड़ों सालों से मरम्मत के अभाव में अस्तित्व पर संकट है। ऐतिहासिक भवनों को संरक्षण की दरकार है।
लुभाते हैं प्राकृतिक नजारे
प्राचीन ऐतिहासिक स्थलों के आसपास के प्राकृतिक नजारे लोगों को काफी लुभाते हैं। यहां ऐतिहासिक पवित्र कुंड भी है। जिसमें सर्दियों में गर्म व गर्मियों में ठंडा पानी रहता है। श्रद्धालु इस कुंड के पानी को गंगा जल की तरह पवित्र मानते हैं। बारिश के दौरान पहाड़ों से कल कल की आवाज के साथ गिरने वाला झरना काफी लुभाता है।
गुढ़ाचंद्रजी. गढ़मोरा गांव में जर्जर महल।
Published on:
01 Jan 2023 12:44 pm
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