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मध्यकाल से पहचान बनाए हुए है मंडरायल का किला

अद्भुत चित्रकारी और झलकती ऐतिहासिकता मंडरायल. यहां मौजूद ऐतिहासिक दुर्ग स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है। यह किला पूर्व मध्यकाल का एक प्रसिद्ध दुर्ग रहा है। मध्यप्रदेश एवं राजस्थान की सीमा पर मौजूद इस दुर्ग को मंडरायल के किले के नाम से जाना जाता है। चम्बल नदी से पांच किलोमीटर पहले कस्बे में एक उन्नत शिखर पर मौजूद है। इसका निर्माण लाल पत्थरों से कराया गया है। राजा मण्डपाल के समय इसके निर्माण का आंकलन किया जाता है। इसका निर्माण कार्य ११वीं सदी के आसपास होना बताया जाता है। क्षेत्रीय किवदंतियों के अन

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मध्यकाल से पहचान बनाए हुए है मंडरायल का किला

मध्यकाल से पहचान बनाए हुए है मंडरायल का किला

मध्यकाल से पहचान बनाए हुए है मंडरायल का किला
मंडरायल. यहां मौजूद ऐतिहासिक दुर्ग स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है। यह किला पूर्व मध्यकाल का एक प्रसिद्ध दुर्ग रहा है। मध्यप्रदेश एवं राजस्थान की सीमा पर मौजूद इस दुर्ग को मंडरायल के किले के नाम से जाना जाता है। चम्बल नदी से पांच किलोमीटर पहले कस्बे में एक उन्नत शिखर पर मौजूद है। इसका निर्माण लाल पत्थरों से कराया गया है। राजा मण्डपाल के समय इसके निर्माण का आंकलन किया जाता है। इसका निर्माण कार्य ११वीं सदी के आसपास होना बताया जाता है। क्षेत्रीय किवदंतियों के अनुसार इस दुर्ग का नामकरण मंडन ऋषि के नाम पर हुआ। जिन्होंने इस पहाड़ी पर काफी समय पहले तपस्या की और बाद में यहां मौजूद ताल में समाधिस्थ हो गए। कुछ सीढिय़ां पार करने के बाद किले का मुख्य भू-भाग आता है।

मिलते हैं कई मंदिर और दर्शनीय स्थल

किले के मुख्य द्वार के पास झरोखे युक्त कचहरी और तलघर तहखाने बने है। दो तालाब भी है। किले के बीचों बीच शाही परिवार के स्नान सहित अन्य व्यवस्थाएं हैं। बड़े तालाब के पास चित्रकारी युक्त गुंबज और बारह द्वारी बनी हुई है। उसके सामने हनुमान मंदिर है। काफी समय पूर्व यहां गोपालजी और बलदाऊजी का मंदिर भी हुआ करता था। तालाब के दूसरी तरफ प्रसिद्ध भैरव नाथ लहरगिर महाराज का मंदिर स्थापित है जहां प्रत्येक सोमवार को कई जगह से श्रद्धालु दर्शन को आते हैं। मंदिर के पुजारी चिरंजी लाल शर्मा के निधन के बाद पुजारी गजेंद्र उर्फ गज्जू महाराज प्रतिदिन सेवा पूजा कर रहे हैं। जानकार बताते हैं कि बयाना के महाराजा विजयपाल के पुत्र मदनपाल ने मंडरायल दुर्ग का निर्माण कराया था। जागाओं की पोथी में लिखे लेख में इसका वर्णन मिलता है।
दिनभर रहता है सूर्य का प्रकाश

किले के दो दरवाजे हंै, जिनमे मुख्य द्वार परिपूर्ण कला से निर्मित आकर्षक का केंद्र है वही दूसरा सूरजपोल के नाम से जाना जाता है, जहां सूरज की पहली किरण से आखिरी किरण उसमें रहती है। यह द्वार इस बात के लिए प्रसिद्ध है, कि इसमें सुबह से शाम तक सूर्य का प्रकाश देखा जा सकता है। इसी दरवाजे की तराई में मंडरायल कस्बा आबाद है। जिसके तीनों और बड़े-बड़े दरवाजों युक्त प्राचीर है। मंडरायल दुर्ग करौली से ४० किमी की दूरी पर दक्षिण पूर्व में है। पूर्व में मंडरायल अपने बागों लिए प्रसिद्ध था। मंडरायल का यह दुर्ग ग्वालियर के पास स्थित होने से मध्यकाल में बड़ा प्रसिद्ध था। इस किले को ग्वालियर की कुंजी भी माना जाता था। लेकिन आज देखरेख और संरक्षण के अभाव में यह अस्तित्व खोता जा रहा है।
केप्शन मंडरायल किला