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करौली-धौलपुर संसदीय क्षेत्र: राष्ट्रीय-स्थानीय मुद्दों के भंवरजाल में उलझा मतदाता

प्रत्याशीभाजपा - मनोज राजौरिया कांग्रेस - संजय कुमार जाटव

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करौली

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Abdul Bari

Apr 22, 2019

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करौली-धौलपुर संसदीय क्षेत्र: राष्ट्रीय-स्थानीय मुद्दों के भंवरजाल में उलझा मतदाता

सुरेन्द्र चतुर्वेदी/करौली।

वैसे तो करौली-धौलपुर संसदीय क्षेत्र ( Karauli-Dholpur Lok Sabha constituency) में चुनाव के दौरान जातिवादी राजनीति हावी रहती है, लेकिन मौजूदा संसदीय चुनाव (Lok Sabha Election 2019) में राष्ट्रीय और स्थानीय मुद्दे भी प्रभावी दिख रहे हैं। जहां भाजपा की ओर से राष्ट्रीय मुद्दों को हवा दी जा रही है, वहीं कांग्रेस स्थानीय मुद्दों और समस्याओं को उछाल रही है। ऐसे में मतदाता राष्ट्रीय और स्थानीय मुद्दों के भंवरजाल में उलझे हुए हैं। डांग इलाके में आपराधिक वारदात विशेष तौर पर डकैतों की सक्रियता के लिए चर्चित रहे करौली-धौलपुर जिलों को जोड़कर वर्ष 2009 में अनुसूचित जाति को आरक्षित नया संसदीय क्षेत्र बनाया गया। इन दोनों जिलों की समस्याएं और स्थिति-परिस्थिति लगभग एक जैसी हैं। विकास में डांग और डकैत रोडा साबित हुए हैं। यहां न तो नए उद्योग विकसित हो पाए और न रोजगार के साधनों का विकास हुआ। रोजगार की कमी से धौलपुर जिले के लोग अपनी सीमा से लगे मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश में तथा करौली जिले के लोग गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिणी प्रदेशों में रोजगार के लिए पलायन कर जाते हैं।

आगरा से सटे होने के कारण धौलपुर में उद्योगपतियों ने कारखाने तो लगाए, लेकिन अनुकूल माहौल और समुचित सरकारी संरक्षण नहीं मिलने से यह ठप हो गए। आधे से अधिक इकाइयांं बंद पड़ी हैं। क्षेत्र के प्रसिद्ध सैण्ड स्टोन कारोबार ने वन-पर्यावरण की बंदिशों के कारण दम तोड़ दिया है। इससे भी रोजगार की समस्या विकराल हुई है। इनके अलावा गांवों में पानी की किल्लत, जर्जर सड़कों की समस्याएं भी बड़ी हैं, जिनसे लोग आहत हैं। लोगों का मानना है कि राजनीतिक इच्छा शक्ति कमजोर होने का दंश यह इलाका पिछड़ेपन के रूप में झेल रहा हैं। पिछड़ेपन को दूर करने के लिए केन्द्र सरकार ने दोनों जिलों को देश के अतिपिछड़े जिलों की सूची में शामिल तो किया, लेकिन विकास की दिशा में कुछ होता दिखा नहीं। प्रदेश की पूर्ववर्ती सरकार द्वारा सरमथुरा-धौलपुर की नेरोगेज लाइन को हेरिटेज के लिए संरक्षित करने की अभिशंसा करके केन्द्र सरकार द्वारा स्वीकृत करौली-धौलपुर रेल परियोजना के चलते काम को रुकवाना भी स्थानीय चुनावी मुद्दों में शामिल है। रेल के मामले सहित स्थानीय मुद्दों को लेकर कुछ इलाकों में सांसद के प्रति नाराजगी दिखती है। जबकि चंबल पुल की स्वीकृति को लोग उनकी उपलब्धि भी बताते हैं।

भाजपा नेताओं द्वारा प्रचार में राष्ट्रवाद को वरीयता दी जा रही है। हालांकि वो करौली जिले के मण्डरायल में चंबल पुल की स्वीकृति, लालसोट से धौलपुर वाया करौली होते हुए मेगा हाइवे निर्माण, धौलपुर जिले में राजाखेड़ा लिफ्ट सिंचाई परियोजना की स्वीकृति, धौलपुर में पासपोर्ट कार्यालय तथा मेडिकल कॉलेज की स्वीकृति को अपनी उपलब्धि बताते हैं। कांग्रेस रेल परियोजना को ठप कराने से लेकर क्षेत्रीय समस्याओं के समाधान में सांसद के नाकाम रहने को हवा दे रही है। ऐसे में यहां का चुनाव राष्ट्रीय मुद्दे और क्षेत्रीय मुद्दों के बीच होता दिख रहा है।

यह है राजनीतिक स्थिति

भाजपा ने सांसद मनोज राजौरिया को तीसरी बार मैदान में उतारा है। जबकि कांग्रेस ने युवा चेहरे संजय जाटव को टिकट दिया है। वर्ष 2009 के परिसीमन में करौली-धौलपुर जिलों को जोड़ गठित इस संसदीय क्षेत्र में शामिल करौली जिला, सवाईमाधोपुर में और धौलपुर जिला बयाना संसदीय क्षेत्र में शामिल था। यहां से पहली बार कांग्रेस के खिलाड़ीलाल बैरवा सांसद चुने गए, जो अब बसेड़ी से विधायक हैं। दूसरी बार में भाजपा के मनोज राजौरिया सांसद निर्वाचित हुए। पिछले चुनाव में मनोज राजौरिया ने कांग्रेस के लक्खीराम बैरवा को 27 हजार मतों से पराजित किया था। संजय जाटव को कांग्रेस प्रत्याशी बनाए जाने से लक्खीराम नाराज हैं। इस टिकट का विरोध खिलाड़ीलाल ने भी किया था, लेकिन बाद में वे संग लग गए। हिण्डौन विधायक भरोसी अपने पुत्र के लिए टिकट चाह रहे थे। टिकट को लेकर कांग्रेस में काफी खींचतान रही। भाजपा-कांग्रेस के सीधे मुकाबले के बीच में आए बहुजन समाज पार्टी के रामकुमार बैरवा कांग्रेस समीकरणों को बिगाड़ सकते हैं।

पिछले चुनावों के हाल

संसदीय क्षेत्र के दोनों जिलों के चुनावी इतिहास का विश्लेषण करें तो इलाके को कांग्रेस का गढ़ कहा जा सकता है। चार माह पहले के विधानसभा चुनाव में करौली जिले की चारों विधानसभा सीटों में से किसी पर भी भाजपा नहीं जीत पाई। सपोटरा, हिण्डौन, टोडाभीम में कांग्रेस के विधायक चुने गए, जबकि करौली से बसपा की जीत हुई। धौलपुर जिले में बाड़ी, बसेड़ी, राजाखेड़ा से कांग्रेस के विधायक चुने गए। केवल धौलपुर में भाजपा को विजय मिली। वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस को करौली, सपोटरा, टोडाभीम मेें जीत मिली थी। पांच माह बाद हुए संसदीय चुनाव में भी कांग्रेस इन तीनों क्षेत्रों से बढ़त में रही थी। धौलपुर जिले में कुछ इस स्थिति उलट रही। वहां विधानसभा चुनाव में बाड़ी, बसेड़ी, राजाखेड़ा कांग्रेस के विधायक चुने गए, लेकिन संसदीय चुनाव में पूरी तरह से चारों सीटों पर भाजपा को अच्छी खासी बढ़त मिली, जिसके कारण मनोज राजौरिया सांसद निर्वाचित हो पाए थे।

ये हैं मुद्दे

1. रोजगार के संसाधनों का अभाव, लोगों का पलायन
2. सडक़ों की हालत खस्ता, जिससे आवागमन के साधनों की कमी

3. उद्योग धंधों का अभाव
4. करौली-धौलपुर रेल परियोजना का ठप कार्य

5. बजरी खनन पर लगी रोक, जिससे पनपा माफिया राज
6. सेण्ड स्टोन के कारोबार को पुनर्जीवित करने के प्रयास

6. वन क्षेत्र का फिर से सर्वे और सीमांकन

कुल मतदाता - 17.96 लाख
पुरुष मतदाता - 9.66 लाख

महिला मतदाता - 8.30 लाख

जनता बोली
इलाके में प्रचार का शोर कम है। होर्डिग्स और बैनर भी आचार संहिता की सख्ती के चलते गायब हैं। लेकिन मतदाताओं की चुनावी चर्चाएं परवान पर हैं। वो क्षेत्र से लेकर राष्ट्र के मुद्दों पर बोलते हैं। समस्याओं में गांव-कस्बों की पानी-बिजली, सड़क, गंदगी की गिनाते हैं। उनको सरोकार नहीं कि कौनसी समस्या प्रदेश सरकार के स्तर की है या केन्द्र सरकार के स्तर की। करौली-धौलपुर के कुछ इलाकों का दौरा करने के दौरान कुछ इस तरह का माहौल ही दिखा। करौली-सरमथुरा इलाके के लोगों के जहन में रेल परियोजना का काम ठप होने का मुद्दा समाया हुआ है। सरमथुरा के चौराहे पर रामप्रसाद माली बोला, हमारी रेल लाइन को चलतौ काम रुकवाय दीनो।

बाडी क्षेत्र में पत्थर के धंधे की मंदी को लेकर खनन मजदूर आहत नजर आए। बाड़ी के हरेत मीणा ने बताया कि पत्थर को धंधौ चौपट है गयौ। कोई सरकार या धंधे की सुध ले तो रोटी खायवै कूं धंधौं मिले। यहां एक थड़ी पर बैठे लोग चुनाव की चर्चा करने पर बोले, कोई की हवा नाय। मौकै पर ही फैसलों करैंगे। उन्होंने मुकाबला केवल दो में बताया। बसेडी में भी लोग रोजगार को लेकर परेशान नजर आए। घर के बाहर खड़ी मंगलबाई क्षेत्र की भाषा में बोली, किसी को वोट दे आवेंगे। हम कूं तो रोटी की चिंता सतावै। काम-धंधे यहां पर हैं नाहीं।
इधर करौली जिले में सूरौठ के स्थानीय पत्रकार निर्मल जाट ने बताया कि चंबल का पानी जगर और पांचना बांध में लाने के मामले में सबने वादा खिलाफी की है। 20 वर्ष से चुनाव में इस नाम पर केवल बातें और वादे करके भूल जाते हैं। महावीरजी के रास्ते में अकबरपुर के ब्रजेन्द्र पटेल से पूछा तो अपने इलाके में पानी, बिजली, चिकित्सा जैसी मुसीबतों को गिनाने लगे। महावीरजी में पूर्व शिक्षा अधिकारी रमेश गर्ग ने भ्रष्टाचार को प्रमुख चुनावी मुद्दा बताया।

करौली शहर में सेवानिवृत्त शिक्षिका संतोष शर्मा से बात की तो उन्होंने करौली रेल परियोजना के रोके गए काम को मुद्दा बताया। मण्डरायल के सुरेन्द्र भाई ने सड़कों की खराब हालत के साथ अस्पताल में डॉक्टरों की पद खाली होने की परेशानी बता दी। मण्डरायल के मनाखुर पहुंचे तो पानी की समस्या से त्रस्त लोगों के लिए यह ही प्रमुख मुद्दा था। टोडाभीम क्षेत्र के निसूरा गांव में राजेश कसाना ने बताया कि इलाके में ज्यादातर गुर्जर जाति के लोग हैं, जिनके परिजन सैन्य सेवा में हैं। वे चुनाव में सर्जिकल स्ट्राइक को प्रमुख मुद्दा माने हुए हैं। नादौती तहसील के कैमरी गांव में मंदिर के बाहर देशराज सिंह से पूछा तो बोला देश की सुरक्षा का सवाल महत्व रखता है। ये ही चुनाव को प्रभावित करेगा।


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