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100 साल पहले जहां व्यापार के साथ थीं संगीत की गूंज, महामारी से अब सिर्फ खंडहर खड़े रहे गए हैं वहां

100 साल पहले जहां व्यापार के साथ थीं संगीत की गूंज, महामारी से अब सिर्फ खंडहर खड़े रहे गए हैं वहां

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करौली

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Vijay ram

Jan 08, 2018

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मंडरायल (राजस्थान).
राजस्थान में ऐसे कई गांव—कस्बे कहानियों में सुने गए जहां चौबीसों घंटे चहल—पहल और बाजारों के साथ ही घर—आंगन की रौनक चकाचौंध कर देती, लेकिन वे फिर कभी ऐसे बर्बाद भी हो गए कि खंडहर ही खड़े रह गए। आपने उनके बारे में सिर्फ सुना होगा लेकिन, अब जो हम बताने जा रहे हैं, वह कोई किताबी किस्सा नहीं है बल्कि हकीकत है। महामारी का वो सच, जो लील गई गौरव गाथा...

राजस्थान पत्रिका के जर्नलिस्ट विनोद शर्मा ने करौली में वह स्थान खोजा, जो 100 बरस पहले व्यापार की दृष्टि से सरसब्ज था। रोजाना हजारों रुपए का लेन-देन होता और सुबह शाम संगीत के स्वर गूंजते लेकिन अब सिर्फ खंडहर में तब्दील होकर रह गया है।

यह कहानी है मण्डरायल तहसील के गुरदह गांव की। इस गांव के बारे में कहा जाता है कि एक महामारी फैलने से यह उजड़ गया। इस गांव में अब पहाड़ों के बीच हवेली तथा दुकानों के खंडहर है। ये खंडहर हवेली अतीत की दास्तां बयां करती हैं।

बुजुर्गो के अनुसार गुरदह गांव ब्राह्मण, मीना जाति के परिवारों का आबाद गांव था। बताते हैं यहां १२०० परिवार रहते थे। लेकिन ९५ साल पहले गांव में महामारी फैलने से सैकड़ों की संख्या में मौत हुई जिससे गांव वीरान हो गया। यहां के मकान, हवेली खण्डर हो गए। इसके बाद से इसका नाम उजड़ गुरदह में पड़ गया। हालांकि बाद में नया गुरदह बस गया लेकिन पुराने गुरदह तो खण्डर के रूप में दिखता है। उजड़ गुरदह गांव में जन्म लेने वाले कुंजीलाल मीना (९३) बताते है कि गांव में महामारी फैली थी, जिसकी चपेट में पूरा गांव आ गया।

सैकड़ों की संख्या में लोगों की बीमारी से मौत हो गई। इससे दहशत फैल गई, जो बचे वो घरों को छोड़ मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश सहित करौली, हिण्डौनसिटी में जा बसे, जो ग्रामीण दूसरे स्थानों पर नहीं गए, वे उजड़ गुरदह को छोड़ समीप के जंगलों में बस गए। तब से ये गांव वीरान है।

पुरातत्व विभाग संरक्षण में ले
उजड़ गुरदह गांव में प्राचीनकाल की कई ऐतिहासिक हवेली है, जिनका निर्माण वर्तमान समय में मुश्किल है। प्रत्येक हवेली में १५ से २० कमरे, सीढ़ी, चौक, गोदाम तथा रसोई बनी हुई हैं। हवा के लिए झरौखे हैं। प्रत्येक हवेली में पत्थर पर बेजोड़ नक्काशी और कलाकृतियां हैं। आज भी यह गांव दूर से सुन्दर दिखाई देता है। पुरातत्व विभाग इसे संरक्षण में ले तो गांव की धरोहर को बचाया जा सकता है। इसे पर्यटन के लिए भी विक्सित किया जा सकता है।

यादव और लोधाओं में हुआ था संघर्ष
इलाके के ग्रामीण सुनी हुई किवदंतियों के आधार पर बताते हैं कि ब्राह्मण और मीनाओं से पहले गुरदह गांव यादव और लोधाओं का था। किसी बात पर दोनों पक्षों में झगड़ा हुआ। लोधाओं ने यादवों को मार-पीट दिया। यादवों ने मीनाओं से गुहार लगाई, जिस पर गंगापुर सिटी क्षेत्र के पीलोदा गांव के मीनाओं ने गुरदह गांव आकर लोधाओं से युद्ध किया। जिसमें लोधाओं को परास्त किया। ऐसी मान्यता है गांव की एक देवी के श्राप से यादव गांव से चले गए। पूजा-अर्चना के लिए एक मात्र परिवार बचा था, जो अभी तक गांव में है। गांव में यादवों के परिवार दो-तीन हो जाते हैं। लेकिन रहता एक ही है।

कोयले और चावल का था व्यापार
उजड़ गुरदह गांव 500 साल पहले इतना विकसित था कि आज जिले के बड़े गांव और कस्बे नहीं है। गांव में धौ की लकड़ी की प्रचुरता तथा संसाधन होने से यहां लोहे का उत्पादन होता था। समीप के कोटरा की पहाड़ी पर लोहे को पकाने वाली भट्टी बनी हुई हैं, पहाड़ी के नीचे नदी है। जहां से पानी की आपूर्ति होती। कोटरा के जंगल में आज भी लोहे के अवशेष काफी संख्या में देखे जा सकते हैं। कोटरा से लोहे को पकाने के बाद गुरदह गांव में लाया जाता, जहां दुकानों से उसे बेचने की व्यवस्था की जाती।

महामारी लील गई गांव की गौरव गाथा
गांव के रामेश्वर मीना (७०) ने बताया कि गांव में धान की खेती होती थी। ऊंटगाडिय़ों से चावल को धौलपुर, मध्यप्रदेश बेचने के लिए लेकर जाते तथा वहां से वापस आते समय लोहे को पकाने वाली मिट्टी लेकर आते। इस कारण लोहे और चावल का व्यापार खूब था। गुरदह गांव को देखने पर पता चला कि वहां सुव्यविस्थत बाजार, सड़कें चौड़ी थी तथा गांव में चारों तरफ से रास्ते हैं। बताते हैं कि उम्दा व्यापार के कारण गुरदह के ब्राह्मण काफी अमीर थे। काफी सोना-चांदी जमीन में गाड़कर रखा हुआ था। गांव खाली होने के बाद काफी लोग यहां सोने की तलाश में आए और खुदाई करके सोना ले गए।

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और... 500 साल पहले इतना विकसित था कि आज जिले कस्बे भी नहीं है...