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जवान करगिल में शहीद हो गया, अब स्मारक की अनदेखी, वीरांगना भटक रही नौकरी के लिए

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hira singh jat

हिण्डौनसिटी। दो दशक पूरे होने में एक वर्ष बचा है, लेकिन घर की दीवारों पर सेना की वर्दी में टंगी तस्वीरें हीरासिंह जाट की शहादत की यादों को ताजा रखे हुए है। मुकंदपुरा गांव में तलाई के पास लोगों का सैलाब, मुख्यमंत्री से लेकर स्थानीय नेताओं का जमावड़ा और 'जब तक सूरज चांद रहेगा हीरासिंह तेरा नाम रहेगा' के गगनभेदी नारों के बीच तिरंगे में लिपटी पार्थिवदेह। इस मंजर को याद कर वीरांगना उर्मिलादेवी का मानो कलेजा मुंह को आ जाता है।

पूरे उन्नीस वर्ष बीत गए हैं, बेटा चंद्रशेखर महज सात माह था, कि जम्मू-कश्मीर में करगिल की बर्फीली पहाडिय़ों में पाकिस्तानी घुसपैठियों के विरुद्ध ऑपरेशन करगिल विजय में 21 जून 1999 को शहीद हो गए।

जाट रेजीमेंट में तैनात हीरासिंह शहादत से चार माह पहले कश्मीर में तैनाती के दौरान छुट्टी लेकर बेटे का चेहरा देख दुलारने आए थे। उस समय चंद्रशेखर तीन माह का था। पालने में हाथ-पैर उछालते बेटे और सैनिक पिता का एक बार ही दीदार हो सका।

कुछ माह बाद तो झुंझुनों से खेलने वाले हाथ पिता को मुखाग्नि को देने बढ़ाने पड़ गए। बकौल चंद्रशेखर, पिता की जीवित सूरत भले ही जेहन में नहीं है, लेकिन मां से सुनी पिता की शहादत और संघर्ष की कहानी शहीद हीरासिंह का बेटा होने का फक्र कराती हैं।

राज्य सरकार ने भी हीरासिंह की शहादत को चिर स्मरणीय बनाने के लिए मुकंदुपुरा के राजकीय प्राथमिक विद्यालय का नामकरण शहीद के नाम कर दिया। यह विद्यालय अब माध्यमिक स्तर में क्रमोन्नत हो चुका है। संबल बनी सहायता राशि हीरासिंह के शहीद होने पर केन्द्र व राज्य सरकार की ओर से सहायता व घोषित पैकेज परिजनों को मिला।

इन सबसे अलहदा राजस्थान पत्रिका के जलमंगल चैरेटेबल ट्रस्ट द्वारा दी गई 50 हजार रुपए की सहायता राशि रही। आमजन से संकलित यह राशि विपरीत परिस्थितियों में काम आई। वहीं जाट रेजीमेंट के बरेली सेंटर से भी प्रति वर्ष पत्राचार कर सैन्य शहीद परिवार की कुशलक्षेम जानते हैं। वहीं वर्ष-दो वर्ष में मुख्यालय से सैनिक भी हाल जानने आते हैं।

पेंशन से कर रही बेटे का पालन
पति की शहादत के बाद बेटे की परवरिश के लिए उर्मिला हिण्डौन आ गई। सरकार से मिली मदद से महवा रोड पर मकान बनवा बेटा चंद्रशेखर के साथ रह रही है। 19 वर्षीय पुत्र स्वयंपाठी छात्र के रूप में बीए द्वितीय वर्ष की पढ़ाई कर रहा है।

शहीद स्मारक की अनदेखी
सैनिक कल्याण बोर्ड से कुछ माह पहले आए दल ने केन्द्रीय विभाग में सेवाएं देने के लिए चंद्रशेखर के दस्तावेज लिए हैं। शहीद स्मारक की राह बदहाल देश के लिए करगिल की दुर्गम पहाडिय़ों में प्राण न्यौछावर करने वाले शहीद हीरासिंह के स्मारक की राह अनदेखी से जटिल बनी है। शहीद की प्रतिमा पर नमन के लिए पहुंचना सहज नहीं है। ग्राम पंचायत प्रशासन भी इसकी सुध नहीं ले रहा है।


स्थिति यह है कि गांव से शहीद स्मारक तक के लिए स्वीकृत लॉकिंग टाईल्स सडक़ स्कूल तक बनाकर छोड़ दी है। स्कूल के मुुख्य द्वार तक डेढ़़ सौ मीटर लम्बा रास्ता घूरों व गंदगी के ढेरों से अटे हैं। स्मारक दोनों द्वार दरवाजों के बिना झाडिय़ों से बंद किए हुए हैं।