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लसोड़ा की फसल पर मौसम की मार, कम पैदावार से बागवान परेशान

Weather hit on Lasoda crop, gardeners upset due to low yield पहले कोहरे की कमी,अब गर्मी से हुआ नुकसान

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लसोड़ा की फसल पर मौसम की मार, कम पैदावार से बागवान परेशान

लसोड़ा की फसल पर मौसम की मार, कम पैदावार से बागवान परेशान

हिण्डौनसिटी.
क्षेत्र में गिरते भूजल स्तर के चलते नवाचार कर शुष्क बागवानी कर रहे किसान इस बार मौसम की दोहरी मार से परेशान हैं। पहले सर्दी और अब गर्मी लसोड़े की फसल के अनुकूल नहीं होने से पेड़ों में फलोत्पादन नहीं हुआ है। कम पैदावार होने से बागों में पेड़ों से लसोडा की तुड़ाई किसानों की जेब पर भारी पड़ रही है।


बिना सिंचाई और कम खर्च के परम्परागत खेती से दोगुनी आमदनी के लिए जलसेन के पार स्थित फत्तूकापुरा, देवरेनियानकापुरा सहित कई ढाणियों के किसानों द्वारा शुष्क बागवानी के तहत कई बीघा खेतों लसोड़े के पौधे लगाए हुए हैं। लसोडों के पेड़ इन दिनों फल(लसोडे) से लकदक रहते थे। लेकिन इस बार पेड़ों में गत वर्ष की तुलना में 15-20 फीसदी ही फलोत्पादन हुआ है।

शुष्क बागवानी कर रहे किसान संतोष अग्रवाल व ओमप्रकाश धाकड़ ने बताया कि इस वर्ष के लसोड़े की बागवानी मौसम की दोपहर मार से पस्त हो गई है। सर्दियों कड़ाके की ठण्ड तो पड़ी लेकिन कोहरा अपेक्षाकृत कम छाने से पेड़ों में समय पर पतझड नहीं हुआ। वहीं गर्मियों में शुरुआत में अप्रेल मेंं ही तापमान के परवान चढऩे से गर्मी में फूलों के झड़ जाने से पेड़ों में फल (लसोड़े) नहीं बने। ऐसे में काफी कम फलोत्पादन होने किसान को लसोडे की तुलाई की महंगी मजदूरी दुगनी आय की बजाय खर्चे का सौदा साबित हो रही है।

दवा से कराया कृतिम पतझड़-
लसोड़े की बागवानी कर रहे संतोष अग्रवाल ने बताया कि जनवरी व फरवरी माह में अपेक्षित अवधि तक घना कोहरा नहीं छाने से पौधों में पतझड नहीं हुआ। ऐसे में दवाओं का छिडकाव पतझड़ कराया गया। जिससे पेड़ों में नई कोंपलों के फुटान के साथ फूल खिलने की प्रक्रिया शुरू हो सके। फूलों के सीजन में तेज धूप और तापमान के बढऩे से फूल झड़ गए।

एक पेड में होता 60 किलो फलोत्पादन-
किसानों ने बताया कि लसोडा़ को पौधा खेत में रोपई के दो वर्ष बाद फल देने लगता है। लसोडे का पेड़ का मई व जून माह में फल देता है। एक पेड़ में करीब 60 किलो लसोड़े लगते हैं। बाजार भाव औसतन 2200-2400 रुपए होता है। किसानों अनुसार दो बीघा भूमि में रोपे 200 पौधों से प्रति वर्ष सीजन में 90 से 100 क्विंटल लसोड़ा लगता है।

गुजरात व पुष्कर आ रहा लसोड़ा-
किसानों ने बताया कि स्थानीय बागों में कम फलोत्पादन होने से शहर की सब्जी ंमंडी में गुजरात व पुष्कर क्षेत्र से लसोड़ा आ रहा है। हालांकि बाहर का हरा लसोड़ा कम गूदा बड़ी गुठली होने कम गुणवत्ता का है। जबकि यहां बागों में कलम रोपन से तैयार किए पेड़ों पर भूरे रंग का लसोड़ा छोटी गुठली व अधिक गूदे का होता है। जो अचार के लिए ज्यादा उम्दा माना जाता है।


खर्चा न देखभाल की जरुरत
एक दशक से लसोड़े की बागवानी कर रहे किसान संतोष अग्रवाल ने बताया कि उन्होंने क्षेत्र में सबसे पहले लसोड़े का पौधे रोप बाग तैयार किया। सिंचाई, रखरखाब और सुरक्षा पर नाममात्र का खर्च होने से लसोडे की बागवानी से बिना मोटा खर्च किए बिना ही आय होती है। शुरु में लसोडे के पौधों के बीच गेहूं व चाना के छोटी फसलें की जाती है। बाद में पेड बडे होने पर खेत में जुताई नहीं होने से अन्य फसलें नहीं हो पाती हैं। फिलहाल इलाके में आधा दर्जन से अधिक किसानों ने 2-2 बीघा में लसाड़े का बाग लगाया हुआ है।