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Margshirsh mela अग्नि में भी न जलने वाली हड्डियां यहां 72घंटे के अंदर पानी में घुल जाती हैं

-मार्गशीर्ष मेला में तीर्थनगरी सोरों में हजारों श्रद्धालु -भगवान विष्णु ने वराह के रूप में लिया था अवतार -हिरण्याक्ष का वध करके पृथ्वी को मुक्त कराया था तुलसी जन्मभूमि, सीता रसोई, गंगाकुंड, भूत का घर

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Varah

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कासगंज। उत्तर भारत का प्रसिद्ध कासगंज जनपद के तीर्थनगरी सोरों का मार्गशीर्ष मेला दिव्य और भव्य बना हुआ है। 15 दिन तक चलने वाले मार्गशीर्ष मेला की एक नहीं, अनेक विशेषताएं और रहस्य हैं। आपको बता दें कि हरपदीय गंगाकुंड में मृतक पूर्वजों की किए जाने वाले अस्थियां मात्र घंटे में पानी में घुल मिल जाती है। सोरों में ही भगवान विष्णु ने वराह का अवतार लेकर पृथ्वी को मुक्त कराया था। वराह अवतार विष्णु के दशावतारों में से एक है।

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सोरों में लिया वराह अवतार
कासगंज जनपद की सोरों तीर्थ नगरी रहस्यों की नगरी कहीं जाती है। सृष्टि का उद्धार करने के लिए भगवान विष्णु ने वराह के रूप में अवतार लिया था। यह अवतार भगवान ने वराह (शूकर) के रूप में लिया, तभी से इस नगरी का नाम शूकर क्षेत्र रखा गया। शूकर क्षेत्र सोरों में एक नहीं अनेक आस्था के केन्द्र हैं। वराह भगवान मंदिर के महंत विदिहानंद बताते हैं कि शूकर सोरों तो महिमा से भरा पड़ा है। हमारे यहां कई अवतार हुए हैं। दशावतारों में दो जलचर और दो वनचर, दो भूप, चार विप्र के अवतार हुए हैं। जलचर में कक्ष और मक्ष आ गए। वनचर वराह भगवान और नरंसिह भगवान हैं। दो भूपों में श्रीराम और श्रीकृष्ण आ गये। चार विप्र हैं, परशुराम, बावन, बुद्ध, कपिल भगवान दशावतार में आते हैं। इस अवतार में भगवान वराह ने हिरण्याक्ष का वध कर और पृथ्वी को जलपर स्थापित किया था। जल के अंदर पूरी पृथ्वी को छिपा दिया था। बहुत बलशाली था दैत्य। उससे देवता भी हार गए थे। भगवान ने वराह का अवतार लेकर वध किया था।

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72 घंटे में पानी में गल जाती हैं हड्डियां

तीर्थ पुरोहित सोरों विक्रम पांडे बताते हैं कि मान्यता है कि यहां भगवान ने वराह (तृतीय अवतार) के रूप में एकादशी के दिन व्रत रखकर पंचकोसी की परिक्रमा की थी। बाद में हिरणअयाक्ष का वध कर हरिपदीय गंगा कुंड को नाखूनों से खोदकर अपने प्राण कुंड में त्याग दिये थे। तभी से इस कुंड में स्नान करने से पापों से मुक्ति मिलती है। मृत पूर्वजों की अस्थियां विसर्जन करने से उनकी आत्मा का शांति मिलती है। विसर्जन की जाने वाली अस्थियां 72 घंटे यानि तीन के दिन के अंदर पानी में घुल मिलकर रेणु रूप हो जाती है। तभी से मार्गशीर्ष मेले का शुभारंभ हुआ था।

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भूत का घर भी हैं यहां

सोरों के तीर्थ पुरोहित मनोज पराशर ने सोरों की महिमा के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि यहां भगवान वराह, तुलसी जन्मभूमि, तुलसी पाठशाला, रत्नावली की रसोई, सीता की रसोई, हरपदीय गंगाकुंड के अलावा भूत का घर हैं। भूत का घर रात ही रात में बनकर तैयार हुआ था। इसके अलावा देश में चार वृक्षों में से एक वट वृक्ष के अलावा तमाम आस्था से जुड़े हुए रहस्यों की नगरी सोरों है। बदांयू से मार्गशीर्ष मेले का स्नान करने आई श्रद्धालु ममता ने बताया कि हरपदीय गंगा में जो भी स्नान करने आता है, वह धन्य हो जाता है। साथ ही पाप मुक्त हो जाता है।

कई राज्यों से आ रहे श्रद्धालु
सोरों हरपदीय गंगा कुंड की महिमा में देश भर फैली हुई हैं। यहां मार्गशीर्ष मेले में राजस्थान, मध्यप्रदेश, हरियाणा, दिल्ली के अलावा उत्तर प्रदेश के विभिन्न जनपदों के लोग यहां स्नान करने के लिए जुट रहे हैं। वैसे तो यहां हर दिन स्नान का सिलसिला बदस्तूर जारी रहता है, लेकिन मार्गशीर्ष मेले में स्नान का विशेष महत्व है।

गृहस्थी की सामान भी मिलता है
सोरों तीर्थ नगरी का मार्गशीर्ष मेले में नारंगी और खजुला की बिक्री सबसे अधिक होती है। श्रद्धालु नारंगी और खजुला को प्रसाद के रूप में खरीद कर अपने घरों को ले जाते हैं। 15 दिन तक चलने वाले मार्गशीर्ष मेले में लोग सर्कस, चरख, झूलो को लुत्फ उठाते हैं। गृहस्थी के सामान की भी जमकर खरीदारी करते है। मार्गशीर्ष मेले में प्रशासन ने सुरक्षा के उद्देश्य से कड़े बदोबस्त किए है। अस्थाई कोतवाली की स्थापना कर सदा वर्दी में पुरुष और महिला कांस्टेबलों को तैनात किया है।

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