Video: मध्यप्रदेश के इस नगर में खुदाई के दौरान निकल रहीं 11वीं सदी की करोड़ों रुपयें की मूर्तियां, देखने लगा हुजूम

जिला मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर पुष्पावती नगरी बिलहरी में सोमवार की शाम नदी में पुल निर्माण की खुदाई के दौरान 11वीं सदी की अनूठी प्रतिमाएं निकली हैं। नदी से खुदाई में पंचमुखी शिव प्रतिमा, विष्णु भगवान के कई स्वरूपों वाली प्रतिमा सहित दो अन्य देवी-देवताओं सहित 10 छोटी मूर्तियां हैं। मूर्तियों में अद्भुत नक्काशी है।

By: balmeek pandey

Updated: 29 Jan 2020, 12:01 PM IST

Katni, Katni, Madhya Pradesh, India

कटनी. जिला मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर पुष्पावती नगरी बिलहरी में सोमवार की शाम नदी में पुल निर्माण की खुदाई के दौरान 11वीं सदी की अनूठी प्रतिमाएं निकली हैं। नदी से खुदाई में पंचमुखी शिव प्रतिमा, विष्णु भगवान के कई स्वरूपों वाली प्रतिमा सहित दो अन्य देवी-देवताओं सहित 10 छोटी मूर्तियां हैं। मूर्तियों में अद्भुत नक्काशी है। मूर्तियां निकलने की सूचना मिलते ही देखने वालों का तांता लग गया है। पुरातत्व विभाग के मल्टी टॉस्क सर्विस बिलहरी प्रदीप जैन के अनुसार ये सभी मूर्तियां नीले रंग के पत्थर की बनी हुई हैं। मूर्तियों की नक्काशी और रंग को देखकर बाजार में इनकी कीमत कई करोड़ रुपये की है। नायब तहसीलदार बिलहरी प्रियंका नेताम ने बताया कि संगम नदी घाट स्लीमनाबाद रोड पर प्रधानमंत्री सड़क योजना के तहत पुल का निर्माण चल रहा है। पुल निर्माण के लिए सोमवार की शाम खुदाई की जा रही थी। इसी दौरान एक के बाद एक चार मूर्तियां निकलीं। निर्माण एजेंसी ने तत्काल पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों को सूचना दी। रात भर मौके पर मूर्तियों की सुरक्षा की गई। मंगलवार को नायब तहसीलदार प्रियंका नेताम, आरआइ संतोष श्रीवास्तव, पटवारी आनंद पांडेय, बिलहरी चौकी पीएसआइ राहुल परमार, एसआइ रमेश कौरव, सरपंच गौरीशंकर गोस्वामी आदि मौके पर पहुंचे। मूर्तियों को साफ कराते हुए बिलहरी पुलिस चौकी में सुरक्षित रखवाया है।

पुराना है इतिहास
बता दें कि बिलहरी का इतिहास बड़ा पुराना है। पुष्पावती नगरी में कल्चुरी, चेरीकाल राजाओं ने कई वर्षों तक शासन किया फिर इनके पतन के बाद चंदेल और फिर गौंड राजाओं ने शासन किया। नगर अपने विशाल ऐतिहासिक समृद्ध विरासत के लिए जाना जाता है। यह नगर पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित किया गया है। 11वीं शताब्दी कलचुरि वंश के राजा केयूरवर्ष, लक्ष्मणराज, सहित राजाकर्ण के राज्य का तपसीमठ, विष्णुवाराह मंदिर, 13 बावली, 85 शिवालय, गयाकुंड, नौ देवियों के मंदिर, कामकंदला आदि बने हुए हैं। इतिहासकारों के अनुसार इस जगह की स्थापना अंगराज कर्ण ने पुष्पावती नगर के नाम से की थी।

कहानी बयां कर रहीं धरोहरें
तपसी मठ को कामकंदला किला के नाम से भी जाना जाता है। इस मठ का निर्माण 14वीं शताब्दी में किया गया था। इस मठ के अंदर फांसी घर, फोर्ट, मठ, बाबडी और शिव मंदिर है। यह मठ भारतीय पुरातत्व विभाग के अंतर्गत आता है। मुख्य प्रवेश द्वार के बिल्कुल बाएं एक बाबड़ी बनी हुई है जिसके बारे में यह कहा जाता है कि इसका पानी कभी खत्म नहीं होता है। इस बाबड़ी की गहराई लगभग 50 फीट है। यह बाबड़ी कल्चुरी शैली में बनाई गई है। मुख्य द्वार से अंदर प्रवेश करते ही बाईं ओर संरचना बनी हुई है तथा दाईं ओर नोहलेश्वर मंदिर। मंदिर की स्थापना काल ब्रिटिश काल की प्रतीत होती है जिसमें रेत, ईंट आदि का प्रयोग कर मंदिर को आधुनिक रुप प्रदान किया है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है जिसमें केवल अब योनि ही शेष बची है ***** चोरी हो चुका है। मंदिर की अंदरुनी छत पर कलात्मक पेंटिंग की जिसमें तरह-तरह की फूल, पत्ती, मछली को दर्शाया गया है। इस मंदिर के अंदर के द्वार के दोनों ओर हनुमान जी की पेंटिंग दिखाई देती है परंतु अब रंग फीके पड़ चुके है। परिक्रमा पथ में गर्भगृह के दो ओर पत्थर से बनी हुई जाली दिखाई देती है। इस मंदिर में प्राचीन का और आधुनिकता से मेल आसानी से देखा जा सकता है। इस मंदिर के समीप एक परिसर दिखाई पड़ता है जिसमें लगभग 450 मूर्तियां रखी हुई है, जिसमें जैन और हिंदु धर्म से संबंधित देवी-देवताओं की मूर्तियां है।

बिखरी पड़ी हैं मूर्तियां
तालाब के किनारे अनेकों मूर्तियां बिखरी पड़ी हुई हैं। इनमें गणेश, विष्णु, देवी, शिवलिंग को आसानी से देखा जा सकता है। गौरवशाली इतिहास बिखरा पड़ा है। पुराने घाट के नजदीक ही छोटी-सी गढ़ी बनी हुई है। तालाब के समीप ही बिलहरी उपथाना के बगल से ही एक मठ बना है। इस मठ का निर्माण कल्चुरीकालीन है। इस मठ के ऊपरी हिस्से का निर्माण 15-16 शताब्दी का है जो गौंड राजाओं ने करवाया था और इस मठ के चारों ओर दीवार बनवाने का कार्य भी किया। ज्ञात होता है कि एक समय था जब यहां एक मंदिर परिसर हुआ करता था।

इनका कहना है
बिलहरी में 11वीं सदी की मूर्तियां निकलने की जानकारी मिली है। इस संबंध में पुरातत्व विभाग से संपर्क कर उन्हें संरक्षित कराने पहल की जाएगी। बिलहरी पुरातत्व की धरोहरों से भरी पड़ी है। इसे सुरक्षित और संरक्षित करने प्रयास किया जाएगा।

शशिभूषण सिंह, कलेक्टर।
सदाशिव, भगवान विष्णु के 10 अवतारों, उनके परिकर, भगवान सूर्य सहित अन्य देवी-देवताओं की कलचुरी काल की प्रतिमा हैं। ये 10वीं व 11वीं शताब्दी के आसपास कीहैं। कीमत की गणना कराई जाएगी। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में ऐसी प्रतिमाओं की कीमत करोड़ों रुपये होती है।
पीसी श्रीवास्तव, डिप्टी डायरेक्टर, पुरातत्व विभाग, जबलपुर।

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