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देश के पांच पुरातत्व संग्रहालयों में रोशन हो रही कटनी की प्राचीन धरोहर

प्रचुर ऐतिहासिक संपदा के बावजूद शहर पर्यटन में पिछड़ा, खुदाई में मिली प्रतिमाओं को एक जगह पर सहेज लें तो सबसे बड़ा संग्रहालय खुल जाएगा

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Ancient Heritage, Archaeological Museum, Estate, Tourism, Katni News

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कटनी। बेशकीमती प्राचीन संपदा और धरोहरों से संपन्न जिला पुरातत्व पर्यटन के नक्शे पर अभी तक उभर नहीं सका है। इसकी बड़ी वजह विरासत को अतीत के अंधेरों से वर्तमान के उजाले में चमकाने में उदासीनता रही है। हैरान करने वाली बात है कि कटनी की अति प्राचीन विरासत से देश के पांच बड़े पुरातत्व संग्रहालय (जो कि अलग-अलग राज्यों की राजधानी में है) रोशन है। लेकिन जिले में अब तक एक म्यूजियम आकार नहीं ले सका है। ऐसी कोई जगह विकसित नहीं की गई कि जहां लोग जिले के ऐतिहासिक गौरवकाल से परिचित हो सकें। कलचुरी काल में शिलाओं पर की गई बेजोड़ कारीगिरी के नमूने को नजदीक से निहार सकें। जबकि जिले में चारों ओर पुरातत्व संपदा और प्राचीन विरासत के अवशेष बिखरे हुए हैं। खुदाई में मिली दुर्लभ और बेजोड़ शिल्प वाली प्रतिमाएं पुरातन समृद्ध इतिहास की हकीकत खुद बयां कर रही हंै। कसर रह गई तो सिर्फ सदियों पुरानी संस्कृति के चिन्हों को संजाने और प्राचीन विरासत को सहेजने की। पुरातत्व जानकारों की मानें तो जिले में मिली प्राचीन संपदा को यदि शहर या किसी एक जगह पर संग्रहित कर लिया जाएं तो यह दुर्लभ प्रतिमाओं का देश का सबसे बड़ा संग्रहालय बन जाएगा।

भोपाल, नागपुर से लेकर विदेशों तक चमक
जिले के पुरातन वैभव की चमक जबलपुर, भोपाल, नागपुर से लेकर विदेशों तक में है। इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चर हैरीटेज (इंटेक) से जुड़े और कटनी निवासी राजेन्द्र सिंह ठाकुर के अनुसार जिले में खुदाई में मिलीं कई प्राचीन प्रतिमाओं को जबलपुर, भोपाल, नागपुर, कोलकाता के पुरातत्व संग्रहालय में सहेजकर रखा गया है। रायपुर के पुरातत्व संग्रहालय की तो शोभा ही कटनी की प्राचीन धरोहरें बढ़ा रही है। छत्तीसगढ़ के इस पुरातत्व संग्रहालय में आधी से ज्यादा प्राचीन प्रतिमाएं कटनी जिले से ले जाकर रखी गई है। जिले की बेशकीमती विरासत का हिस्सा रही बेजोड़ वास्तुशिल्प वाली कुछ दुर्लभ प्रतिमाएं विदेशों तक में चमक बिखेर रही है।

सहेजने की कवायद में भी सुस्ती
जिले की प्रचुर पुरातन संपदा को सहेजने में जिम्मेदार का रवैया सुस्त है। संभागायुक्त से लेकर एएसआई की मंशा प्राचीन प्रतिमाओं को एक जगह संरक्षित करके रखने के लिए संग्रहालय बनाने की है। इसके लिए बिलहरी क्षेत्र में तहसीलदार को जमीन चिन्हित करने के लिए कहा गया है। लेकिन संभागायुक्त की मंशा के निर्देश के बावजूद संबधित तहसीलदार और अन्य अधिकारी संग्रहालय से संबधित कामकाज को लेकर ढुलमुल रवैया बनाए हुए है। इससे पुरातत्व महत्व की संपदाओं को संरक्षित करके प्रदर्शित करने और पर्यटन सुविधा को विस्तार की कवायद ढीली पड़ गई है।

10वीं और 11वीं सदी की कलाकृतियां है
जिले में कलचुरी काल के दौरान के कई अनूठे कलाशिल्प के अवशेष मौजूद हैं। 10वीं और 11वीं सदी की कई दुर्लभ प्रतिमाएं बिलहरी में खुदाई के दौरान भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को मिली हैं। कारीतलाई में 493 ईस्वी के पुरा अवशेष हैं। बडग़ांव और तिगवां में भी अति प्राचीन संपदा के अवशेषों का खजाना है। प्राचीन विरासत की झलक के निशान उमरियापान में भी मिलते हैं। बहोरीबंद के नजदीक रूपनाथ धाम में 232 ईसा पूर्व लिखे गए सम्राट अशोक के संदेश वाला शिलालेख हैं। इन्हें संरक्षित और सुरक्षित करने की जिम्मेदारों की लापरवाही प्राचीन विरासतों को संवारने में बाधा बनी हुई है।