कटनी. यदि आप जंग के मैदान में जा रहे हैं तो तलवार में धार होना चाहिए। आज का युवा जल्दबाजी में रहता है। बहुत जल्दी से रिजल्ट मिलता नहीं है। किसान को भी फसल उगाने के लिए 6 महीने का समय लगता है। सीखिए और सीखने के लिए समय दीजिए। पेसेंस रखिए, काम जानिए फिर मुंबई आइए, मुंबई सबकी है। या फिर अपने कैरियर क्षेत्र में कदम रखिए। यह संदेश है उत्तरप्रदेश के गाजीपुर में जन्मे व कटनी शहर में पले-बढ़े, शिक्षा प्राप्त करने वाले भोजपुरी फिल्मों के एक्टर संजय पांडेय का…। कटनी प्रवास के दौरान पत्रिका से वार्ता में अपनी बात रखी। संजय पांडेय ने कहा कि मुंबई बाजार है, वहां चीजें बिकती हैं, बनती नहीं। बनती तो अपने शहरों में ही हैं। उन्होंने कहा कि खुद को कटनी से तैयार कर मुंबई पहुंचा था। इसके बावजूद भी वहां संघर्ष करना पड़ा। मुंबई की एक अजीब कहानी है कि जब तक वहां कोई आपका काम देखेगा नहीं तबतक काम देगा नहीं। यह सबसे बड़ी चुनौती होती है। संजय पांडेय ने कहा कि 2 साल तक काम की तलाश की, नहीं मिला। लोगों ने कहा था कि यदि आपके अंदर टैलेंट है तो आपको काम मिलेगा। माता-पिता और बुजुर्गों के आशीर्वाद से काम की शुरुआत हुई और काम ठीक-ठाक चल रहा है। 200 से ज्यादा भोजपुरी फिल्में की हैंञ जिसमें दीवाना, सात सहेलियां, राजा बाबू, आशिक-आवारा, बंधन, निरहुआ हिंदुस्तानी, औलाद खास हैं। उन्होंने कहा कि मातृभाषा भोजपुरी थी। मां भोजपुरी बोलती थीं। मां से भोजपुरी बोलना सीखा। बुंदेलखंडी भी बोल लेता हूं। बुंदेलखंड में भी सीरियल किया है। भोजपुरी फिल्मों में बिहारी भोजपुरी ज्यादा उपयोग होती है। भाषा को पकडऩे में काफी वक्त लगा। खलनायक के तौर पर भोजपुरी फिल्म में एंट्री हुई। ऑडियंस का शुक्रगुजार हूं, जिन्होंने खलनायक के रूप में मुझे स्वीकार किया।
यहां बेहतर है कैरियर
पांडेय ने कहा कि भोजपुरी फिल्मों का भविष्य बहुत ही दमदार हैं। अभी भी बेहतर चल रहा है। भोजपुरी ऐसी भाषा है जो हिंदी के बाद सबसे ज्यादा बोलने वाली है। विश्वभर में उत्तर भारतीय मिलते हैं। 5 से 6 चैनल भोजपुरी फिल्में दिखा रहे हैं। फिल्में बिहार, यूपी, गुजरात, मुंबई, राजस्थान, बंगाल, दिल्ली सहित अन्य राज्यों व नेपाल में खूब पसंद की जा रही हैं। कई प्रदेशों व देशों में रिलीज होती हैं। भोजपुरी फिल्मों में युवाओं के लिए अच्छा कैरियर है। आय का साधन सिनेमा और एक्टिंग बेहतर है। संजय पांडे ने कहा कि बारडोली की धरा से उनका गहरा नाता है। कटनी उनकी जान है। कटनी का नाम आते ही मेरे अंदर का तार-तार हिल जाता है और मैं इमोशनल हो जाता हूं। बचपन से मेरा शहर से विशेष जुड़ाव है। मेरा बचपन और कॉलेज सब यही हुआ है। यह मेरी आत्मा है।
डायलॉग से किया प्रभावित
इस दौरान उन्होंने भोजपुरी फिल्म दीवाना का एक डायलॉग भी रिपाट किया। डायलॉग में बताया कि दिनेश लाल यादव निरहुआ भोजपुरी फिल्म के स्टार जब मेरे घर धमकी देने के लिए दरवाजे में आते हैं। तब मैं भाई को रोकता हूं। कहता हूं ‘ओह न बाबू एकरा पे गोली चलाके अपन गोली ज्यान मत कर, का रे महतारी के चिता का राख ठंडा न भइल और मोहब्बत का गर्मी तोहरा के लियाके हमरे दरवाजा पर खड़ा कर डालिस, मगर तोहरा के अपन की बहनी के डोली के कहार न बनउली न तो हम अपने बाप का बेटा नहीं’ संजय पांडेय ने ही 1987 में शहर में संप्रेषणा नाट्य मंच की शुरुआत की थी, जिसके माध्यम से आज भी युवा कलकारों की प्रतिभा निखर रही है। 1994 से 97 तक भोपाल में रंग विदूषक ग्रुप ज्वाइन कर एक्टिंग सीखी और 1999 के बाद से मायानगरी में अभिनय का प्रदर्शन कर रहे हैं। इस दौरान संप्रेषणा नाट्य मंच के जोधाराम जयसिंघानी भी मौजूद रहे।