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कोरोना ने दुख तो बहुत दिए, लेकिन बेटियों की शादी में फिजूलखर्ची रोक दी

समाज में बदलाव के संकेत, कोरोना संक्रमण काल के दौरान जिलेभर में हुईं चार हजार से ज्यादा शादियां, लोग खुश हैं कि अनावश्यक खर्च से बच गए.

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narbad singh

नर्बद सिंह

कटनी. कोरोना संक्रमण काल ने जिले में भी कहर ढाया। तमाम घरों की खुशियां छिन गईं। शुभ मुहूर्त के बाद भी शादियां टालनी पड़ीं। लेकिन, कोरोना ने यह भी सिखा दिया कि फिलूजखर्ची के बगैर शादी-विवाह के आयोजन गरिमापूर्ण ढंग से आयोजित किए जा सकते हैं। इस दौरान हुए आयोजनों में कम खर्च से यह संदेश भी गया कि दिखावे के बिना भी आयोजन हो सकते हैं।

कटनी जिले में भी टेंट, बैंड, पटाखे और खाने पर लाखों रुपए खर्च होने का चलन आम हो गया था। कुछ लोग दिल खोलकर खर्च करते थे। कुछ मजबूरी में मन-मसोसकर भी लाखों का बजट बनाते थे। कोरोना संकट काल ने मन-मसोसकर खर्च करने की मजबूरी से बचा लिया। कटनी में कोरोना संक्रमण के दो साल के दौरान चार हजार से ज्यादा शादियां हुईं। जानकारों के अनुसार इन शादियों में पहले की तुलना में औसत से एक तिहाई खर्च हुआ। लोग खुश हैं कि मजबूरी वाला फिजूलखर्च नहीं हुआ। बेटी की शादी खुशनुमा माहौल में हुई।

24 मई को बेटी की शादी करने वाले पिता नर्बद सिंह बताते हैं कि कोरोना काल में शादी का बड़ा लाभ यह हुआ कि शादी ब्याह में होने वाले फिजूलखर्च से बच गए। इससे तीन साल पहले बड़ी बेटी की शादी किए थे तो टेंट और खाने में ही डेढ़ लाख रुपए खर्च हो गए थे।

इंदल सिंह IMAGE CREDIT: Raghavendra

रिश्तेदार भी नाराज नहीं हुए
- कोरोना काल में अक्षय तृतीया के दिन बेटी की शादी करने वाले इंदल सिंह गोड़ बताते हैं कि इस शादी का बड़ा फायदा यह हुआ जिन रिश्तेदारों को नहीं बुला पाए, तब भी वे नाराज नहीं हुए। अमूमन शादी में कोई रिश्तेदार छूट जाए तो जीवनभर बात होती थी, इस बार ऐसा नहीं हुआ।

मीना रानी IMAGE CREDIT: Raghavendra

दो बेटियों की शादी की
कोरोना काल में 14 और 24 मई को दो बेटियों की शादी करने वाली मीना रानी गोड़ बताती हैं कि पूजा और निक्की का विवाह किया। दो बेटियों के विवाह की हिम्मत ही ऐसे जुटा पाए कि शादी में अन्य खर्चों की चिंता नहीं थी। कोरोना काल की शादी ऐसी थी कि माता-पिता को शादी ब्याह में अन्य खर्च की चिंता नहीं रही।

पड़ोसी नाराज हुए ना रिश्तेदार
- कोविड-19 संक्रमण काल के दौरान होने वाली शादी में एक बात यह भी रही कि न बुलाने पर ना तो रिश्तेदार नाराज हुए और ना ही पड़ोसी।
- मामा, फुफा और जीजा की मौजूदगी में शादी ब्याह के आयोजन हुए, खाना भी घर की महिलाओं ने पकाया।
- ऐसी शादियों में शामिल होने वाले बुजुर्ग रिश्तेदार बताते हैं कि तीन से चार दशक बाद ऐसा मौका आया जब घर की महिलाओं के हाथ का पकाया भोजन बारात में खाने को मिला।
- भोजन के दौरान माहिलाओं ने सोहर (पारंपरिक गीत जिसे आयोजनों पर महिलाएं गाती हैं) और दूसरे पारंपरित गीत भी घर की महिलाओं ने गाए।

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