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तीन साल पहले पहली से लेकर 8वीं तक के बच्चों को थमाई इंग्लिस मीडियम की पुस्तकें, फिर जाने क्या हुआ

अंग्रेजी माध्यम के स्कूल खोलकर शिक्षक देना भूलीं सरकार, जिले में इंग्लिस मीडियम 11 स्कूल हैं संचालित

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कटनी. सरकारी स्कूलों में पढऩे वाले बच्चों को प्राथमिक स्तर से ही अंग्रेजी का ज्ञान कराकर उन्हें निजी स्कूलों के बच्चों की बराबरी पर लाने सरकार की योजना को पंख नहीं लग सके। तीन साल पहले अंग्र्रेजी माध्यम के स्कूल खोलकर सरकार शिक्षक देना भूल गई है। शिक्षकों की कमीं के चलते अंग्रेजी माध्यम के इन स्कूलों में सिर्फ रस्म अदायगी की जा रही है। नए पद भी स्वीकृत नहीं किए गए है।
जानकारी के मुताबिक साल 2015 में प्रदेशभर में अंग्रेजी माध्यम के प्राइमरी व मिडिल स्कूल खोले गए है। जिले में भी 11 स्कूलों को चिन्हित करके अंग्रेजी माध्यम की स्कूल का दर्जा दिया गया है। इसमें ६ मिडिल व 5 प्राइमरी स्कूल है। इनमें से छह स्कूलों में तो अंग्रेजी माध्यम के एक-एक शिक्षकों की नियुक्ति तो कर दी गई, लेकिन 5स्कूलों में अब तक एक भी शिक्षक नहीं दिए गए है। जिस वजह से इंग्लिस मीडियम की इन स्कूलों में दर्ज बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। केवल औपचारिक रूप से ही अंग्रेजी मीडियम से पढ़ाई कराई जा रही है।

अंधकार में बच्चों का भविष्य
हाइस्कूल खलवारा बाजार के पूर्व प्राचार्य पंडित केशवानंद तिवारी के अनुसार अंग्रेजी माध्यम स्कूल खोलने को लेकर शासन की कोई स्पष्ट नीति नहीं होने से बच्चों का भविष्य अंधकार में है। इस साल जो बच्चें कक्षा 8वीं पास करेंगे उनके लिए इंग्लिस मीडियम में कक्षा 9वीं में प्रवेश लेने की फिलहाल कोई व्यवस्था नहीं है। ऐसे में उन अभिभावकों के सामने बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा जो कक्षा 8वीं तक अपने बच्चों को अंग्रेजी मीडियम में पढ़ा चुके है। इन अभिभावकों के पास हाईस्कूल में प्रवेश के लिए पैसे खर्च कर निजी स्कूल में दाखिला दिलाने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा।

जिले में खुली इन अंग्रेजी माध्यम की स्कूलों में नहीं शिक्षक
-शासकीय माध्यमिक शाला विजयराघवगढ।
-शासकीय माध्यमिक शाला देवरी।
-शासकीय माध्यमिक शाला भरतपुर।
-शासकीय माध्यमिक शाला बसाड़ी।
-शासकीय प्राथमिक शाला निर्टरा।

इनका कहना है
जिलेभर में प्राइमरी व मिडिल की 11 अंग्र्रेजी मीडियम की स्कूलें हैं। 5 स्कूलों में शिक्षक नहीं है यह बात सहीं है। शिक्षकों की भर्ती के लिए कई बार आवेदन मंगाए गए, लेकिन कोई आगे नहीं आया।
एनपी दुबे, डीपीसी।
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