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इस शहर में बापू ने निकाली थी हरिजन उद्धार यात्रा, आजादी के लिए विशाल जनसभा को किया था संबोधित

Special story on Mahatma Gandhi Jayanti

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कटनी

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Balmeek Pandey

Oct 02, 2024

2 दिसम्बर 1933 को महात्मागांधी ने निकाली थी हरिजन उद्धार यात्रा, आजादी के लिए विशाल जनसभा को किया था संबोधित

कटनी. अंगेजी हुकूमत की बेडिय़ों में जकड़े देश को आजाद कराने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 2 अक्टूबर को पूरा देश जन्म जयंती मना रहा है। देश के महान सपूत की यादों से कटनी शहर भी अछूता नहीं हैं। 2 दिसम्बर 1933 को जब जनजन में आजादी की चिंगारी जलाते हुए बापू कटनी पहुंचे तो पूरा महाकौशल प्रांत देखने और उनके इस महायज्ञ का भागीदार बनने उमड़ पड़ा था। बापू श्री तिलक राष्ट्रीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में ठहरे। सुबह होते ही बापू हरिजन उद्धार यात्रा के लिए निकल पड़े थे। यहां पर लोगों से मिलकर आजादी की लड़ाई में शामिल होने आवाहन किया और फिर गांधीद्वार होते हुए सभा स्थल पहुंचे थे। बापू जिस स्कूल में ठहरे थे वह आज भी उनकी यादों को समेटे हुए है। देश भर में स्वदेशी का जोर है। हर व्यक्ति समझ रहा है कि देश की तरक्की के लिए स्वदेशी का मंत्र अपनाना जरूरी है। आपको बता दें कि बाल गंगाधर तिलक ने इसके लिए अलख भी जगाई थी। इसकी निशानी आज भी कटनी में है। हालांकि यह निशानी भी अनूठी है, जो विद्यालय के नाम से अपनी गरिमा को बरकरार रखे हुए है। बात हो रही है कटनी के तिलक राष्ट्रीय स्कूल की। यह मध्य प्रदेश का एक मात्र स्वदेशी विद्यालय है। किसी जमाने में इसका आकर्षण और वैभव इतना प्रसिद्ध था कि महात्मा गांधी ने यहां रात्रि विश्राम किया था। उन्होंने इसकी खुलकर प्रसंशा भी की थी। बापू की जयंती और पुण्य तिथि पर विद्यालय आज भी उनका भावपूर्ण स्मरण किया जाता है। इस विद्यालय से निकले छात्र देश भर में जिले और प्रदेश का नाम रोशन कर चुके हैं।

तहसीलदार को सौंपा था ज्ञापन
श्री तिलक राष्ट्रीय उमा विद्यालय के प्राचार्य राकेश तिवारी के अनुसार महात्मागांधी सीधे फारेस्ट प्लेग्राउंड पहुंचे और जनमानस को संबोधित किया। बापू के आवाहन पर क्षेत्र से हजारों की संख्या में लोग आजादी की लड़ाई में शामिल हुए थे। सभा समाप्ति के उपरांत बापू ने तहसीलदार को ज्ञापन सौंपा था। खास बात यह है कि महाकौशल प्रांत से 7 डिक्टेटर नियुक्त किए गए थे, जिसमें से कटनी से प्रथम डिटेक्टर स्कूल के प्राचार्य पं. गोविंद प्रसाद खंपरिया व शिक्षक नरोत्तम प्रसाद शर्मा को बनाया था।

दिया था यह नाम
सभा स्थल जब बापू पहुंचे और विशाल आवाम को देखा तो उन्होंने कहा कि कटनी के लोगों में मैं साफ देख रहा हूं कि हर किसी का आंखों में आजादी का ज्वाला जल रही है। ठीक इसी तरह उड़ीसा का एक गांव है बारडोली वहां के लोगों में भी गजब का उत्साह देखने मिला है। तभी से मुड़वारा-कटनी का दूसरा नाम बारडोली पड़ा था। बापू ने बारडोली में मसाल जुलूस भी निकाला था।

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इसलिए है एकमात्र स्वदेशी स्कूल
जानकारी के अनुसार महाकौशल प्रांत में स्वदेशी शिक्षा के लिए 5 स्कूलों की स्थापना की गई थी। अकोला, खामगांव, तुमसर, रायपुर और कटनी में स्थापना हुई थी। चार गांव के स्कूल वर्तमान में महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में शामिल हो गए हैं और एमपी में एकमात्र स्कूल श्री तिलक राष्ट्रीय स्कूल है जो स्वदेशी शिक्षा के लिए जाना जाता है। इस स्कूल की स्थापना 1921 में की गई थी। यह स्कूल पहली से कॉलेज तक था, जो 1977 में कॉलेज शासन के आधीन कर लिया गया।

अभी भी हैं रिकॉर्ड स्टूडेंट्स
बापू के प्रिय स्कूल श्री तिलक राष्ट्रीय उमा विद्यालय में आज भी सैकड़ों की तादाद में बच्चे पढऩे के लिए आते हैं। कक्षा 1 से 12 तक 800 से अधिक बच्चे अध्ययन कर रहे हैं। इस स्कूल से पढ़कर निकले बच्चों ने शहर का नाम राष्ट्रीय स्तर तक ऊंचा किया है। धरवारा निवासी ओपी गर्ग जहां डीजी रह चुके हैं। वहीं ज्योति प्रकाश नायडू अटलजी की सरकार के समय पीएमओ में रहे। एक स्टूडेंट उत्तराखंड इलेक्ट्रिक बोर्ड के चेयरमैन हैं।

आ चुके हैं बड़े-बड़े दिग्गज
कटनी से आजादी के महासंग्राम में जहां हजारों की संख्या में लोगों ने भागीदारी की, वहीं यहां पर बड़े-बड़े दिग्गज पहुंचे थे। आजादी के पूर्व यहां पर दो प्रांतीय बैठक भी हुई हैं, जिसमें सुंदरलाल तपस्वी, सुभद्रा कुमारी चौहान, शंकरदयाल शर्मा, पं. रविशंकर शुक्ल सहित कई महानायक पहुंचे थे। बापू के आगमन के बाद जो संग्राम का बिगुल बजा उसके बाद से लोगों ने आजादी दिलाकर ही माने।

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सुरक्षित है कमरा
स्कूल के जिस कमरे में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी रुके थे उसे सुरक्षित रखा गया है। स्कूल के इस कमरे को स्टॉफ रूम बना दिया गया है, जहां पर शिक्षक बैठते हैं। कमरे में तिलकजी और बापू की प्रतिमा भी लगी है। आधुनिक शिक्षा और महानगरों में शिक्षा के पचलन के बावजूद भी बापू के इस स्कूल में आज भी युवा अध्ययन के लिए खिंचे चले आते हैं। जिस स्कूल में महापुरुष ठहरे हों और स्वदेशी शिक्षा की अलख जग रही हो वह स्कूल का उपेक्षित रहना किसी दुर्भाग्य से कम नहीं। 1 अगस्त, 1920 को लोकमान्य तिलक का आकस्मिक निधन हो गया। परंतु, जिन आदर्शों के लिए वे जिये वह शाश्वत हैं। जिस राष्ट्र के लिए उन्होंने ‘स्वाधीनता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है’ का नारा दिया आज वह स्वतंत्र और दृढ़ है। स्वदेशी, स्वशिक्षा, भारतीय संस्कृति के उत्थान के लिए उन्होंने जो प्रयास किए वे आज भी प्रासंगिक हैं।