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जंगलों में बढ़ा गिद्धों का कुनबा, दो दिवसीय गणना में 242 मिले ‘ प्रकृति सफाई मित्र’, ये प्रजाति रही खास

विजयराघवगढ़ और रीठी बने गिद्धों के सुरक्षित बसेरे, संरक्षण प्रयासों के दिखने लगे सकारात्मक परिणाम, आज होगी अंतिम गिनती. जिले के विजयराघवगढ़ और रीठी वन क्षेत्र में गिद्धों की सबसे अधिक मौजूदगी दर्ज की गई है

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कटनी

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Balmeek Pandey

May 24, 2026

vulture census is being conducted in Katni district

vulture census is being conducted in Katni district

कटनी. जिले में प्रकृति के सफाई मिद्ध कहे जाने वाले गिद्धों की तीन दिवसीय ग्रीष्मकालीन गणना चल रही है। वन विभाग द्वारा 22, 23 और 24 मई तक चलने वाली इस गणना के दूसरे दिन शनिवार को जिले में कुल 242 गिद्ध रिकॉर्ड किए गए। सुबह 5 बजे से 8 बजे तक वन विभाग की टीमों द्वारा एप और प्रपत्र के माध्यम से गणना की गई। पर्यावरण विशेषज्ञ मोहन नागवानी ने बताया कि प्रदेशभर में करीब 9 हजार टीमें इस अभियान में जुटी हैं।
जिले के विजयराघवगढ़ और रीठी वन क्षेत्र में गिद्धों की सबसे अधिक मौजूदगी दर्ज की गई है। गणना में सर्वाधिक संख्या इंडियन लॉन्ग बिल्ड वल्चर प्रजाति की पाई गई, वहीं कुछ सफेद गिद्ध भी नजर आए। वन अधिकारियों के अनुसार यह ग्रीष्मकालीन गणना है, जिसमें स्थायी रूप से रहने वाले गिद्धों की संख्या दर्ज की जाती है, जबकि शीतकालीन गणना में प्रवासी गिद्ध भी दिखाई देते हैं।

फरवरी की गणना में मिले थे 282 गिद्ध

इससे पहले फरवरी माह में हुई गिद्ध गणना में विजयराघवगढ़ एवं रीठी वन परिक्षेत्र में कुल 282 गिद्ध दर्ज किए गए थे। इनमें 225 वयस्क और 57 अवयस्क गिद्ध शामिल थे। साथ ही 135 घोंसले चिन्हित किए गए थे, जिनमें 132 सक्रिय और 3 निष्क्रिय पाए गए। वन विभाग के अनुसार फरवरी की गणना में 236 घमर (व्हाइट रम्प्ड) गिद्ध, 21 लॉन्ग बिल्ड गिद्ध, 12 सफेद गिद्ध, 6 देसी गिद्ध लॉन्ग बिल्ड और 2 राज गिद्ध पाए गए थे। विजयराघवगढ़ क्षेत्र में 111 और रीठी क्षेत्र में 24 घोंसले दर्ज किए गए थे। विशेषज्ञों का मानना है कि कभी विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी गिद्ध प्रजातियों की बढ़ती संख्या वन क्षेत्र में बेहतर संरक्षण और सुरक्षित वातावरण का संकेत है।

खास-खास:

  • पूरे विश्व में गिद्धों की 23 प्रजातियां, भारतवर्ष में नौ एवं मध्य प्रदेश में सात सहित कटनी में गिद्ध की 3 प्रजातियां।
  • लॉन्ग बिल्ड वल्चर, व्हाइट रम्प वल्चर, रेड हेड वल्चर एवं इजिप्शियन वल्चर हैं मध्य प्रदेश के स्थाई निवासी, ठंड के मौसम में हिमालय ग्रिफान, यूरेशियन ग्रिफिन एवं सिनेरियस आते हैं वल्चर।
  • दूसरे दिन प्रदेश में 9063 रिकॉर्ड की गई जबकि शीतकालीन गणना प्रवासी गिद्धों के साथ में यह संख्या थी 15,628।
  • गिद्ध परिस्थितिकी तंत्र के एक महत्वपूर्ण घटक हैं जिन्हें प्रकृति का सफाई कर्मी भी कहा जाता है, यह मृत पशु शरीरों को खाकर एन्थरेक्स, कई प्रकार के रोगों से जीवों की करते हैं रक्षा।
  • दक्षिण पूर्व एशिया में लगभग 5 करोड़ गिद्ध पाए जाते थे 1985 से लेकर 2000 तक इनकी संख्या में 99 प्रतिशत तक गिरावट आई, जिसका कारण पशु चिकित्साकीय उपयोग में लाई जाने वाली एक दवा डाइक्लोफिनेक थी।
  • भारत सरकार ने इसके पशु चिकित्साकीय उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है, इसके अतिरिक्त तीन अन्य दवाएं एसिक्लोफिनेक, कीटोप्रोफेन एवं नीमूसेट के भी पशु चिकित्साकीय उपयोग पर प्रतिबंध लगाया गया है क्योंकि यह भी गिद्धों के लिए घातक सिद्ध हुई है।
  • भारतवर्ष में एकमात्र प्रदेश मध्य प्रदेश हैं जो वर्ष 2016 से गिद्ध गणना कर रहा है एवं उनमें वृद्धि के लिए प्रयासरत है, लोगों में गिद्ध संरक्षण के प्रति जन जागरूकता पैदा की जा रही है ताकि इस संकटग्रस्त प्रजाति को फिर से मूल स्वरूप में लौटाया जा सके।