
छत्तीसगढ़ में दूल्हा उठाता है दुल्हन की शादी का पूरा खर्चा ( Photo - Patrika )
Chhattisgarh Marriage: छत्तीसगढ़ अपनी अनूठी परंपराओं के लिए प्रचलित है। वहीं शादी के समय में निभाई जाने वाली कई परंपरों में से एक है उठवा बिहाव परंपरा, जो मुख्य रूप से आर्थिक परिस्थितियों से जुड़ा हुआ है। आज भी कवर्धा के नेऊर क्षेत्र में बैगा-आदिवासी समाज अपनी विशिष्ट परंपराओं और सामाजिक व्यवस्थाओं के लिए जाना जाता है जो आधुनिक समय में भी जीवित हैं। इन्हीं परंपराओं में एक अनूठी परंपरा है उठवा बिहाव जो आज भी समाज में प्रचलित है। इस परंपरा का संबंध मुख्य रूप से आर्थिक परिस्थितियों से जुड़ा हुआ है।
जब किसी लड़की का परिवार विवाह का खर्च उठाने में असमर्थ होता है तब लड़के का परिवार स्वयं आगे बढ़कर विवाह की पूरी जिम्मेदारी संभालता है। इस स्थिति में लड़के पक्ष द्वारा बारात लेकर लड़की के घर पहुंचा जाता है और विवाह का अधिकांश खर्च भी वही वहन करता है। ग्रामीण और वनांचल क्षेत्रों में यह परंपरा आज भी सामाजिक सहयोग और आपसी समझ का प्रतीक मानी जाती है। इससे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की बेटियों का विवाह सम्मानपूर्वक संपन्न हो पाता है।
बैगा समाज पर शोध करने वाले गोपीकृष्ण सोनी के अनुसार बैगा समाज में उठवा बिहाव की परंपरा वर्तमान समय में भी काफी प्रचलित है। उन्होंने बताया कि दूल्हा अपने परिवार और गाजे-बाजे के साथ लडक़ी के घर पहुंचता है जहां नगाड़ा बजाकर उनका स्वागत किया जाता है। इसके बाद रात में हल्दी की रस्म होती है भोजन कराया जाता है और फिर दुल्हन की विदाई की जाती है। दूल्हे के घर पहुंचने के बाद विवाह की शेष रस्में पूरे रीति-रिवाज के साथ संपन्न की जाती हैं।
वनांचल ग्राम नेउर के निवासी महादेव सोनी ने बताया कि यह परंपरा केवल विवाह की एक पद्धति नहीं बल्कि बैगा समाज की सामुदायिक एकता, सहयोग और संवेदनशीलता का प्रतीक है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के वनांचल क्षेत्रों में रहने वाले बैगा समुदाय में आज भी इस तरह की परंपराएं समाज को मजबूती प्रदान कर रही हैं। उठवा बिहाव आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए आज भी एक सहारा बनी हुई है और सामाजिक समरसता की मिसाल पेश करती है। यह अन्य समाज के लिए प्रेरणादायक है।
Updated on:
12 Apr 2026 06:21 pm
Published on:
12 Apr 2026 06:20 pm
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